
नई दिल्ली। नेपाल और तिब्बत सीमा पर आई भीषण विनाशकारी बाढ़ एवं त्रासदी के कारणों सैकड़ों लोगों की मौत हो गई है। कई लोग अब भी लापता हैं। कुछ सुरंग में फंसे हुए हैं। राहत कार्य तेजी से चल रहा है। इस बीच भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) के हैदराबाद स्थित नेशनल रिमोट सेंसिंग सेंटर (NRSC) ने सैटेलाइट तस्वीरों के आधार पर इसके कारण को लेकर बड़ा खुलासा किया है।
ग्लेशियर का बड़ा हिस्सा ढहा
इसरो की उपग्रह तस्वीरों (Resourcesat-2A, Sentinel-2 और Landsat-9) के शुरुआती विश्लेषण के अनुसार, सीमावर्ती उच्च हिमालयी इलाके में स्थित ग्लेशियर का लगभग दो-तिहाई (2/3rd) हिस्सा टूटकर अचानक गिर गया।

हिम-चट्टान स्खलन
ग्लेशियर के टूटने से भारी मात्रा में बर्फ, चट्टानें और मलबा बड़ी तेजी से नीचे की ओर बहा।
अस्थायी बांध का टूटना
मलबे के भारी बहाव के कारण कुछ देर के लिए नदी का प्राकृतिक मार्ग अवरुद्ध (ब्लॉक) हो गया। इसके तुरंत बाद जब यह अस्थायी बांध टूटा, तो जमा हुआ पानी और मलबा एक भीषण ‘फ्लैश फ्लड’ और मलबे के जलसैलाब के रूप में नीचे की ओर उमड़ पड़ा।
नदियों का उफान
इस आपदा के कारण भोटे कोशी और त्रिशूली नदी का जलस्तर अचानक बहुत ज्यादा बढ़ गया, जिससे आसपास के घाटी वाले इलाके जलमग्न हो गए और भीषण तबाही मची।
सबसे प्रभावित क्षेत्र
रसुवा जिला (नेपाल): रसुवागढ़ी, तिमुरे और त्रिशूली नदी कॉरिडोर क्षेत्र सबसे अधिक प्रभावित हुए। इस अचानक आई बाढ़ से जलविद्युत परियोजनाओं, सड़कों, पुलों और स्थानीय बस्तियों को भारी नुकसान पहुंचा है।
वैज्ञानिकों का ये मानना
अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों और वैज्ञानिकों का भी मानना है कि शुरुआती भूकंपीय तरंगें किसी सामान्य भूकंप की नहीं, बल्कि इसी विशाल ग्लेशियर के ढहने और मलबे के खिसकने के कारण पैदा हुई थीं।
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