जनगणना में कुड़मी धर्म व कुड़माली भाषा को दें अलग कोड

झारखंड
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  • सांसदों व आदिवासी कुड़मी समाज का प्रतिनिधिमंडल मिला रजिस्ट्रार जनरल व जनगणना आयुक्त से

गिरिडीह। आगामी जनगणना-2026 में ‘कुड़मी/सरना-कुड़मी धर्म’ को पृथक धर्म कोड और ‘कुड़मी/कुड़माली’ को पृथक मातृभाषा/भाषा कोड प्रदान करने की मांग की गई। इसे लेकर आदिवासी कुड़मी समाज, केंद्रीय समिति का एक प्रतिनिधिमंडल सांसद बिद्युत वरण महतो, सांसद चंद्र प्रकाश चौधरी व सांसद ज्योतिर्मय सिंह महतो की अगुवाई में 6 अगस्‍त को नई दिल्ली में भारत के रजिस्ट्रार जनरल एवं जनगणना आयुक्त (ओआरजीआई) से मिलकर उन्हें एक विस्तृत ज्ञापन सौंपा।

प्रतिनिधिमंडल ने ओआरजीआई को इस बात से अवगत कराया कि कुड़मी समाज झारखंड, पश्चिम बंगाल, ओडिशा, बिहार, असम व छत्तीसगढ़ सहित देश के अनेक राज्यों में निवास करने वाला एक विशिष्ट सांस्कृतिक एवं भाषाई समुदाय है। वर्तमान व्यवस्था में अलग कोड उपलब्ध नहीं होने के कारण समुदाय की धार्मिक एवं भाषाई पहचान जनगणना के आंकड़ों में स्पष्ट रूप से दर्ज नहीं हो पाती, जिससे उनकी वास्तविक जनसांख्यिकीय स्थिति सामने नहीं आती।

यह भी कहा कि कुड़माली भाषा की अपनी समृद्ध लोक परंपरा, साहित्य, व्याकरण व सांस्कृतिक विरासत है। विभिन्न शैक्षणिक संस्थानों में इसके अध्ययन की पहल भी की जा चुकी है। इसी प्रकार समुदाय की पारंपरिक आस्था एवं प्रकृति-पूजक धार्मिक परंपरा को भी स्वतंत्र पहचान मिलनी चाहिए।

प्रतिनिधिमंडल ने इस विषय से भी अवगत कराया कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 29, 30, 350ए एवं 350बी सहित अन्य संवैधानिक प्रावधान देश की भाषाई व सांस्कृतिक विविधता के संरक्षण की भावना को सुदृढ़ करते हैं। इसलिए जनगणना में समुदाय की स्व-घोषित धार्मिक व भाषाई पहचान को पृथक रूप से दर्ज करने की व्यवस्था की जानी चाहिए।

इस दौरान केंद्र सरकार से आग्रह किया कि जनगणना-2026 के प्रपत्रों एवं दिशा-निर्देशों में आवश्यक संशोधन कर ‘कुड़मी/सरना-कुड़मी धर्म’ और ‘कुड़मी/कुड़माली’ के लिए पृथक कोड सुनिश्चित किए जाएं। प्रतिनिधिमंडल में अजीत प्रसाद महतो, शशांक शेखर महतो, कमलेश महतो, कृष्णा पद महतो, प्रेमचंद महतो, आनंद महथा,  राधा नाथ महतो व वनमाली महतो शामिल हुए।

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