
मुंबई। महाराष्ट्र के नंदुरबार की जिला कलेक्टर (IAS Officer) मितालि सेठी ने अपने बच्चों की शुरुआती शिक्षा को लेकर एक ऐसा फैसला लिया है, जिसकी हर तरफ चर्चा हो रही है। उन्होंने अपने तीन साल के जुड़वां बच्चों को किसी महंगे प्राइवेट प्री-स्कूल के बजाय एक स्थानीय सरकारी आंगनवाड़ी में दाखिला दिलाया है।
एक कार्यक्रम में अपने इस फैसले के पीछे की वजह बताते हुए उन्होंने स्पष्ट किया कि यह कोई बड़ा राजनीतिक या प्रशासनिक बयान नहीं था, बल्कि उन्हें आंगनवाड़ी का माहौल और वहां काम करने वाले लोगों पर पूरा भरोसा था।
मितालि सेठी ने बताया कि उन्होंने बच्चों के तीसरे जन्मदिन पर उन्हें बिल्कुल वैसे ही आंगनवाड़ी भेजा, जैसे उस गांव की कोई अन्य मां करती है। यह उनके घर के पास था और उन्हें वहां का परिवेश बहुत पसंद आया।
एक घटना का जिक्र करते हुए उन्होंने बताया कि आंगनवाड़ी में बच्चों के वजन तौलने वाली पारंपरिक ‘झोली’ से बच्चे अक्सर रोने लगते थे। तब एक आंगनवाड़ी वर्कर ने स्थानीय दर्जी की मदद से एक ऐसी आरामदायक झोली तैयार करवाई, जिससे बच्चों को परेशानी न हो और वे रोना बंद कर दें। इस संवेदनशीलता और समस्या-समाधान के तरीके ने मितालि सेठी को बहुत प्रभावित किया।
कलेक्टर के इस फैसले से उनके माता-पिता और ससुराल वाले पहले थोड़े आशंकित थे और उन्हें लगा कि वह शायद कोई साबित करने की कोशिश कर रही हैं। हालांकि, अपनी जिद के चलते उन्होंने किसी की नहीं सुनी और आज उनके बच्चे 4 साल के हो चुके हैं।
उन्होंने एक वाकया साझा किया जब उन्होंने अपने बच्चे को भेड़ के साथ खेलते देखा और बच्चे ने उसे अपना ‘दोस्त’ बताया। इन छोटी और सहज चीजों ने उन्हें विश्वास दिलाया कि उनका यह फैसला सही है।
मितालि सेठी का यह फैसला किसी पर दबाव बनाने के लिए नहीं है, बल्कि यह इस बात का उदाहरण है कि यदि जमीनी स्तर की संस्थाओं पर भरोसा किया जाए, तो वे बच्चों के शुरुआती विकास के लिए बेहतरीन जगह साबित हो सकती हैं।
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