

- अपनी जड़ों से जुड़े रहकर भी ऊंचाइयां हासिल की जा सकती हैं : डॉ केरकेट्टा
रांची। झारखंड लोक सेवा आयोग की पूर्व अध्यक्ष एवं रिटायर आईएएस डॉ मेरी नीलिमा केरकेट्टा ने कहा है कि अपनी परंपरा, संस्कृति और जड़ों से जुड़े रहकर भी आसमान की ऊंचाइयां हासिल की जा सकती हैंI आधुनिकता, पैसे और भौतिक सुविधाओं की होड़ में आदिवासी समाज को अपनी जड़ों से कटना नहीं है। वह शनिवार को बिरसा कृषि विश्वविद्यालय में आयोजित विश्व आदिवासी दिवस समारोह को मुख्य अतिथि के रूप में संबोधित कर रही थीं।
बीएयू की पूर्ववर्ती छात्रा रही डॉ केरकेट्टा ने कहा कि यह दिवस पूरे विश्व के जनजातीय और देशज समाज की संघर्ष गाथा, संस्कृति और प्रकृति संरक्षण में उनके योगदान को पहचान एवं सम्मान देने का अवसर है। आदिवासी समाज पेड़-पौधे, पहाड़, नदियों, जैव विविधता और वन्य जीवों के साथ संतुलन बनाकर सदियों से जीता रहा हैI

डॉ केरकेट्टा ने कहा कि मोबाइल फोन के इस दौर में जब ज्यादातर लोग अलग-थलग पड़कर परिवार और समाज से कटते जा रहे हैं, जनजातीय समाज में सुख-दुख, तीज-त्योहार, रीति-रिवाज और कृषि कार्य में अब भी सामुदायिक भावना बलवती है। इस समाज में हर दिन मेल-मिलाप और शाम में मांदर और गीतों के साथ उत्सव का माहौल सहज द्रष्टव्य है।
जनजातीय गीतों में प्रकृति के महत्त्व और सौन्दर्य का जो वर्णन है, वह अद्भुत और अतुलनीय है। दुनिया के विकसित समाज में महिला सशक्तिकरण की बात पिछले कुछ दशकों से हो रही है, किन्तु आदिवासी समाज में महिलाएं सदियों से सशक्त और अधिकार संपन्न हैं। कार्यक्रम पूर्व मुख्यमंत्री दिशोम गुरु शिबू सोरेन की पुण्य स्मृति को समर्पित था।

बिरसा कृषि विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ एससी दुबे ने कहा कि आदिवासी समाज ने पौधों, फलों, वृक्षों, औषधीय वनस्पतियों और पशु-पक्षियों की देशज प्रजातियों और नस्लों को सदियों से सुरक्षित एवं संरक्षित रखा है, जिनमें दुनिया को ज्यादा समृद्ध, स्वस्थ और शक्तिशाली बनाने की क्षमता है।
वैज्ञानिक जब शोध और प्रसार कार्यों के सिलसिले में गावों में जाएं, तब वहां के बुजुर्गों से बात कर देशज तकनीकी ज्ञान प्राप्त करें। वैज्ञानिक आधार पर उनके प्रलेखन, विश्लेषण और सत्यापन का प्रयास करें। इससे वह पारंपरिक ज्ञान सम्पदा भावी पीढ़ी के लिए सुरक्षित रहेगी।
कुलपति ने कहा कि आदिवासी समाज से महिला सशक्तिकरण का जीवंत उदाहरण सीखने की जरूरत है। आज पूरे देश के कृषि विश्वविद्यालयों में प्रवेश पानेवाले विद्यार्थियों में लड़कियों की संख्या ज्यादा है। उन्होंने कहा की ईश्वर ने महिलाओं को ज्यादा परिश्रमी, संवेदनशील, धैर्यवान, उदार, सहनशील और समन्वयशील बनाया है। इसलिए जिस परिवार, समाज और समूह में मातृशक्ति के विचारों, सलाहों एवं निर्णयों को समुचित पहचान व सम्मान दिया जाता है। वहां शांति, प्रगति और सम्पन्नता ज्यादा दिखती है।
आरम्भ में बीएयू के छात्र कल्याण निदेशक डॉ बीके अग्रवाल ने स्वागत किया। कार्यक्रम का संचालन विश्वविद्यालय की सांस्कृतिक समन्वयक डॉ नंदनी कुमारी ने किया।
सारे पुरस्कार छात्राओं ने जीते
इस अवसर पर आयोजित प्रतियोगिताओं में सारे पुरस्कार लड़कियों ने जीते। वक्तृत्व कला प्रतियोगिता में वानिकी महाविद्यालय की शाहीन परवीन ने प्रथम और रांची कृषि महाविद्यालय की साक्षी प्रिया एवं जोया परवीन ने क्रमशः द्वितीय एवं तृतीय पुरस्कार प्राप्त किया।
आर्ट प्रतियोगिता में वानिकी महाविद्यालय की कल्याणी कुमारी ने प्रथम, रांची कृषि महाविद्यालय की सलोनी कुमारी कश्यप ने द्वितीय और वानिकी महाविद्यालय की अनामिका महतो ने तृतीय स्थान प्राप्त किया।
विश्वविद्यालय के छात्र-छात्राओं ने पारंपरिक वेश-भूषा में मांदर और नगाड़े के साथ स्वागत गीत और हो, मुंडा, संथाल, बिहू, छत्तीसगढ़ी, सम्भलपुरी, उरांव एवं नागपुरी समूह नृत्य प्रस्तुत किया। सांस्कृतिक प्रस्तुतियों का समन्वयन विद्यार्थियों की ओर से स्वाति, प्रीती एवं आशीष ने किया। डॉ शशि किरण तिर्की एवं डॉ शिवम मिश्र ने धन्यवाद किया।
यहां सीधे पढ़ें खबरें
खबरें और भी हैं। इसे आप अपने न्यूज वेब पोर्टल dainikbharat24.com पर सीधे भी जाकर पढ़ सकते हैं। नोटिफिकेशन को अलाउ कर खबरों से अपडेट रह सकते हैं। साथ ही, सुविधा के मुताबिक अन्य खबरें भी पढ़ सकते हैं।
आप अपने न्यूज वेब पोर्टल से फेसबुक, इंस्टाग्राम, X, स्वदेशी एप arattai सहित अन्य सोशल मीडिया पर भी जुड़ सकते हैं। खबरें पढ़ सकते हैं। सीधे गूगल हिन्दी न्यूज पर जाकर खबरें पढ़ सकते हैं। अपने सुझाव या खबरें हमें dainikbharat24@gmail.com पर भेजें।
हमारे साथ जुड़ें
व्हाट्सएप ग्रुप
https://chat.whatsapp.com/H5n5EBsvk6S4fpctWHfcLK
स्वदेशी एप ग्रुप
https://chat.arattai.in/groups/t43545f313238383036363337343930333731343936395f32303030323937303330392d47437c3031303131353032363138323137353934323036313934393230



