- कृषि विज्ञान केन्द्रों के वैज्ञानिक ले रहे भाग
रांची। बिरसा कृषि विश्वविद्यालय के प्रसार शिक्षा निदेशालय के तत्वावधान में दो दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम की शुरुआत शुक्रवार को हुई। इसका विषय ‘’जलवायु अनुकूल प्रौद्योगिकियों के माध्यम से कृषि एवं संबद्ध क्षेत्रों पर जलवायु के प्रभावों का प्रबंधन’’ है। इसमें राज्य के सभी कृषि विज्ञान केन्द्रों के वैज्ञानिक भाग ले रहे हैं।

प्रशिक्षणार्थियों को संबोधित करते हुए बिरसा कृषि विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ एससी दुबे ने कहा कि झारखंड की 80 प्रतिशत खेती वर्षा आधारित है। वर्तमान परिस्थिति में मौसम के विभिन्न अवयव जैसे वर्षा की प्रवृत्ति, तापमान, हवा की गति, दिशा, हवा का दबाव, सूर्य प्रकाश की तीव्रता इत्यादि में परिर्वतन हो रहा है। ऐसी परिस्थिति में कृषि वैज्ञानिकों को इसके तत्काल प्रभाव के प्रबंधन से सम्बन्धित तकनीकों का प्रसार करना चाहिए।
कुलपति ने इस वर्ष अलनीनो के प्रभाव से फसलों को होने वाले संभावित नुकसान से निबटने की रणनीतियों पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि कृषि विज्ञान केन्द्रों के वैज्ञानिकों को कृषि कार्य में जलवायु परिवर्तन के प्रतिकूल प्रभावों को कम करने के लिए उचित प्रभेद, फसल विविधिकरण, बोआई-रोपाई के समय में परिवर्तन इत्यादि की परखी हुई तकनीकों का प्रसार करना चाहिए।
प्रसार शिक्षा निदेशक डॉ डीके शाही ने प्रशिक्षण के उद्श्यों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि किसानों को सूखा, बाढ़, ऊष्मा तथा भूमि अम्लीयता सहन करने वाली उन्नत फसल किस्मों से अवगत कराना होगा। जल संसाधनों के विवेकपूर्ण उपयोग पर जोर देना होगा।
डॉ शाही ने वैज्ञानिकों को निर्देश दिया कि पूरे राज्य के कृषि विज्ञान केन्द्रों में 7 जुलाई को मौसम में हो रहे बदलाव के वैज्ञानिक समाधान विषय पर किसानों के लिए प्रशिक्षण आयोजित किया जाय, जिससे जलवायु परिवर्तन की समस्या का समाधान वैज्ञानिक तरीकों से हो सके।
तकनीकी सत्र में आनुवंशिकी एवं पौधा प्रजनन विभाग की अध्यक्ष डॉ मणिगोपा चक्रवर्ती और आईसीएआर शोध संस्थान, पलाण्डु के प्रधान वैज्ञानिक डॉ बालकृष्ण झा ने भी अपने विचार रखे।
अपर निदेशक प्रसार शिक्षा डॉ निरंजन लाल ने धन्यवाद किया। इस दो दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम में राज्य भर के कृषि विज्ञान केन्द्रों के 46 वैज्ञानिक भाग ले रहे हैं।
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