रांची। दशकों से साहिबगंज के स्कूलों में पानी गीली मिट्टी के रंग का बहता था। यूएचएस श्रीरामचौकी की शिक्षिका अनिता कुमारी याद करते हुए बताती हैं, ‘पानी का रंग मटमैला था।‘ बच्चे इसे पीने के बाद अक्सर लंबे समय तक पेट दर्द की शिकायत करते थे। हालांकि, गांव में कोई भी यह नहीं समझ पाता था कि इसकी वास्तविक वजह क्या है। बिहार-झारखंड सीमा से सटे इस क्षेत्र के स्कूलों में वह मटमैला पानी ही मानो सामान्य बात बन चुका था।

साहिबगंज झारखंड का एकमात्र ऐसा जिला है, जहां से गंगा नदी बहती है। इसी कारण यहां के भूजल पर इसका गहरा प्रभाव पड़ा है। दशकों पहले भूजल में आर्सेनिक धीरे-धीरे और चुपचाप समा गया, जिससे यह एक गंभीर पर्यावरणीय चुनौती बन गया। इसका असर वर्षों तक लगातार संपर्क में रहने के बाद धीरे-धीरे दिखाई देता है। इसके कारण लोगों के लिए बार-बार होने वाली स्वास्थ्य समस्याओं को रोज़ाना उपयोग किए जाने वाले पानी से जोड़ पाना कठिन हो जाता है।
आज यह स्थिति साहिबगंज के नौ स्कूलों में अध्ययनरत 3,000 से अधिक विद्यार्थियों के लिए पूरी तरह बदल चुकी है। बीआईटी, मेसरा ने आशा एंड सज्जन अग्रवाल फाउंडेशन के सहयोग से राजकीय मध्य विद्यालय फुदकीपुर, स्वामी विवेकानंद उच्च विद्यालय श्रीधर, यूएमएस सरपंच टोला, एम.एस. किशन प्रसाद, यूपीजी राजकीय मध्य विद्यालय समदा, यूपीजी पीएस शांतिनगर घोघी, यूएचएस श्रीरामचौकी, पीएम श्री नगरपालिका कन्या विद्यालय और सीएम स्कूल ऑफ एक्सीलेंस में पाँच-स्तरीय आर्सेनिक निष्कासन फिल्टर स्थापित किए हैं।
इन सभी विद्यालयों में जो पानी कभी विद्यार्थियों के स्वास्थ्य के लिए खतरा था, वह अब पूरी तरह सुरक्षित हो चुका है। हजारों छात्रों तथा शिक्षकों को निरंतर स्वच्छ एवं जीवनदायी पेयजल उपलब्ध हो रहा है।
इस बदलाव की शुरुआत रांची से झारखंड के सबसे वंचित इलाकों की एक लंबी यात्रा के साथ हुई। इन्फ्रास्ट्रक्चर एंड प्लानिंग के एसोसिएट डीन डॉ. कीर्ति अभिषेक, इलेक्ट्रॉनिक्स एवं संचार अभियांत्रिकी विभाग के डॉ. विशाल एच. शाह और शोधार्थी आकाश ने सड़क मार्ग से लगभग दस घंटे की यात्रा कर इन क्षेत्रों तक पहुंच बनाई।
बीआईटी मेसरा के एक पूर्व छात्र द्वारा स्थापित आशा एंड सज्जन अग्रवाल फाउंडेशन के सहयोग से टीम ने जिले के सबसे अधिक प्रभावित क्षेत्रों में इन ब्लू फिल्टरों को स्थापित किया।
फिल्टर लगाने के बाद टीम ने अपना कार्य वहीं समाप्त नहीं किया। मौके पर किए गए परीक्षणों ने पुष्टि की कि ये फिल्टर पूरी तरह प्रभावी ढंग से कार्य कर रहे हैं। इसका सकारात्मक प्रभाव केवल प्रयोगशाला की रिपोर्टों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि विद्यालयों में प्रत्यक्ष रूप से भी दिखाई दिया।
यूएचएस श्रीरामचौकी की शिक्षिका अनिता कुमारी कहती हैं, ‘ब्लू फिल्टर लगने के बाद अब स्थिति पहले जैसी नहीं रही। पानी बहुत अच्छा हो गया है और सभी इसका उपयोग कर रहे हैं।‘
पीएम श्री नगरपालिका कन्या विद्यालय के विज्ञान शिक्षक अनिकेत कुमार वर्षों से आसपास के गांवों में आर्सेनिक के प्रभाव देखते आए थे। जानते थे कि लंबे समय तक इसके संपर्क में रहने के क्या दुष्परिणाम हो सकते हैं। फिल्टर स्थापित होने के बाद उन्होंने स्वयं पानी की जांच की। उन्होंने कहा, ‘कार्बोनेट तत्व पूरी तरह से खत्म हो गया है।‘
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