दुबई की लग्जरी लाइफ छोड़ भारत आई स्विस महिला, सुदूर गांव में खोला फ्री स्कूल

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कोलकाता। स्विस महिला सैंड्रा लावी गोजकोविक (Sandra Lavie Gojkovic) के पास वह सब कुछ था, जिसे हासिल करने के लिए लोग सालों-साल मेहनत करते हैं। स्विट्जरलैंड में पली-बढ़ीं सैंड्रा ने अपनी पढ़ाई पूरी की। दुबई में एक बेहतरीन कॉरपोरेट नौकरी हासिल की। दुनिया भर की यात्रा की। उनके पास अपना एक आलीशान अपार्टमेंट और शानदार कार थी। वित्तीय सफलता के साथ आने वाले हर ऐशो-आराम उनके पास मौजूद थे।

आज से 15 साल पहले, सैंड्रा ने एक ऐसा फैसला लिया जिसने उनके आसपास के हर इंसान को चौंका दिया। उन्होंने अपनी कॉरपोरेट नौकरी से इस्तीफा दे दिया। बिना किसी बड़ी योजना के अपना सामान समेटा और भारत के लिए उड़ान भर ली।

आरामदायक जिंदगी छोड़ने वाले ज्यादातर लोग भी सफर पर निकलते समय अपने आराम का पूरा सामान समेटते हैं, लेकिन सैंड्रा ने ऐसा नहीं किया। उन्होंने बताया, “मैंने अपनी नौकरी छोड़ी। अपनी आरामदायक जिंदगी को पीछे छोड़ दिया। लगभग खाली हाथ भारत आ गई। यह बदलाव जानबूझकर किया गया था। मैं लग्जरी लाइफ से सीधे केवल दो शर्ट और दो जोड़ी ट्राउजर के साथ यात्रा करने आ गई थी।

सैंड्रा ने बिना किसी सुरक्षा घेरे या परिचित चेहरों के अकेले ही मुख्य रूप से ट्रेनों से भारत की यात्रा की। वह याद करती हैं कि मैंने अकेले ट्रेन से भारत को खंगाला। आज पीछे मुड़कर सोचती हूं तो यह थोड़ा पागलपन लगता है, लेकिन अपनी जिंदगी में पहली बार मैंने खुद को पूरी तरह आजाद महसूस किया। मेरे पास बहुत कम था, फिर भी मैं पहले कभी इतनी खुश नहीं रही थी।

शुरुआत में सैंड्रा का मानना था कि भारत में काम कर रहे मौजूदा संगठनों को केवल वित्तीय सहायता देना ही काफी होगा। हालांकि, जब उन्होंने जमीनी स्तर पर चीजों को देखा, तब उन्हें अहसास हुआ कि वित्तीय कुप्रबंधन और अप्रभावी तरीकों के कारण कई प्रोजेक्ट्स जमीन पर फेल हो रहे थे। इसके बाद उन्होंने खुद एक ऐसा संगठन शुरू करने का फैसला किया जो पूरी तरह से पारदर्शी हो, टिकाऊ हो और लोगों की वास्तविक जरूरतों पर आधारित हो।

इस दौरान उन्होंने एक बेहद महत्वपूर्ण सबक सीखा कि असली बदलाव गांवों से ही शुरू होता है। उन्होंने देखा कि कई परिवार गांवों को छोड़कर शहरों की तरफ भागते हैं, लेकिन वहां जाकर वे अत्यधिक भीड़भाड़ वाली झुग्गियों में संघर्ष करने को मजबूर हो जाते हैं। इसलिए, शहरों में रहने के बजाय उन्होंने स्थानीय लोगों से उन्हें ऐसे गांवों में ले जाने को कहा, जहां आमतौर पर बाहरी लोग नहीं जाते।

इसी तलाश में ढाई घंटे की ट्रेन यात्रा और एक घंटे की नाव की सवारी के बाद वह पश्चिम बंगाल के एक सुदूर और आध्यात्मिक द्वीप ‘सागर द्वीप’ पहुंचीं, जहां कपिल मुनि का आश्रम है। वहां पहुंचकर सैंड्रा ने अपनी तरफ से कोई रेडीमेड समाधान थोपने के बजाय, तीन गांवों के लोगों के साथ बैठकर उनकी समस्याओं और जरूरतों को सुना। यही बातचीत उनके प्रोजेक्ट की नींव बनी।

एक सुदूर भारतीय गांव में स्कूल शुरू करना उतना कठिन नहीं था, जितना एक विदेशी महिला के रूप में स्थानीय माता-पिता का भरोसा जीतना था। सैंड्रा ने बताया कि एक विदेशी होने के नाते मैं जानती थी कि मुझे लोगों का विश्वास कमाना होगा। मैं गांवों में घर-घर गई और माता-पिताओं से अपने बच्चों को स्कूल भेजने का अनुरोध किया।

शुरुआत में कुछ परिवार हिचकिचाए, कुछ उत्सुक दिखे, लेकिन धीरे-धीरे बात फैलती गई। एक बच्चा आया, फिर दस हुए और देखते ही देखते कारवां बढ़ता गया। उनका संगठन आज एक फ्री प्राइमरी स्कूल चलाता है, जहां पांच कक्षाओं में 150 बच्चों को मुफ्त शिक्षा दी जा रही है।

सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले अन्य 120 बच्चों को ट्यूशन सपोर्ट और रोजाना पौष्टिक भोजन दिया जाता है। गांव की 20 महिलाओं को सिलाई की ट्रेनिंग दी जा रही है ताकि वे आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बन सकें। स्कूलिंग के साथ-साथ सैंड्रा की टीम घरेलू हिंसा, बाल विवाह, मानव तस्करी और शिक्षा के महत्व को लेकर लगातार जागरूकता अभियान चलाती है।

सैंड्रा अपने इस सेवा भाव का श्रेय अपने बचपन को देती हैं। उनके माता-पिता बचपन में काफी यात्राएं करते थे। कारवां में की गई उन यात्राओं ने सैंड्रा को अलग-अलग संस्कृतियों और लोगों को बहुत करीब से देखने का मौका दिया। तभी वह समझ गई थीं कि दुनिया इस बात पर निर्भर करती है कि आपका जन्म कहां हुआ है।

कॉरपोरेट करियर छोड़ने के 15 साल बाद भी सैंड्रा को अपने फैसले पर कोई पछतावा नहीं है। अब वह अपनी सफलता को ऊंचे पद या भारी-भरकम सैलरी चेक से नहीं, बल्कि बच्चों से भरी कक्षाओं और उम्मीद की किरण पाती महिलाओं के चेहरों से नापती हैं।

सैंड्रा कहती है कि भौतिक चीजें अस्थायी हैं। वे आराम दे सकती हैं, लेकिन स्थायी संतुष्टि नहीं। सच्चा उद्देश्य दूसरों की सेवा करने से आता है। जरूरतमंदों की मदद करना केवल कुछ ऐसा नहीं है जो मैं करती हूं, बल्कि यह मेरे जीवन का मिशन है और मैं जब तक जीवित रहूंगी, यह काम करती रहूंगी।

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