युद्ध पर अमेरिका और ईरान में MoU, तेल की कीमत पर हुआ ये असर

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फ्रांस। अमेरिका के राष्ट्रपति Donald Trump ने फ्रांस में ईरान के साथ हुए एक मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग (MoU) पर हस्ताक्षर किए हैं। यह समझौता अमेरिका-ईरान संघर्ष को समाप्त करने और आगे की वार्ताओं का रास्ता खोलने के उद्देश्य से किया गया है। एमओयू की खबर का असर कच्‍चे तेल की कीमत पर देखने को मिला।

समझौते की प्रमुख बातें

समझौते पर राष्ट्रपति ट्रंप और ईरान के राष्ट्रपति Masoud Pezeshkian ने हस्ताक्षर किए हैं। इसके तहत दोनों देशों ने तनाव कम करने और अगले 60 दिनों तक व्यापक वार्ता जारी रखने पर सहमति जताई है। रिपोर्टों के अनुसार, समझौते में ईरान के परमाणु कार्यक्रम, प्रतिबंधों में संभावित राहत और Strait of Hormuz में समुद्री यातायात को सामान्य बनाने जैसे मुद्दे शामिल हैं।

तनाव कम होगा

यह हस्ताक्षर समारोह फ्रांस में आयोजित एक विशेष कार्यक्रम और राजनयिक बैठकों के दौरान हुआ। फ्रांसीसी राष्ट्रपति Emmanuel Macron भी इस अवसर पर मौजूद थे। वर्साय में हुए इस आयोजन को दोनों देशों के बीच तनाव कम करने की दिशा में एक प्रतीकात्मक कदम माना जा रहा है।

आगे क्या होगा

MoU लागू होने के बाद अब दोनों पक्षों के बीच विस्तृत और कठिन वार्ताओं का दौर शुरू होगा। अमेरिका ने संकेत दिया है कि यदि समझौते की शर्तों का पालन नहीं हुआ तो प्रतिबंधों या अन्य कदमों पर फिर विचार किया जा सकता है। कई अंतरराष्ट्रीय नेताओं ने इस समझौते का स्वागत किया है। हालांकि, अंतिम परिणाम वार्ताओं की सफलता पर निर्भर करेगा।

समझौते के बाद उम्‍मीद

एमओयू के बाद होर्मुज जलडमरूमध्य के खुलने की उम्मीद है। दुनिया के लगभग 20% समुद्री तेल व्यापार का रास्ता होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरता है। समझौते के बाद इस मार्ग पर जहाजों की आवाजाही सामान्य होने की उम्मीद बढ़ी है, जिससे सप्लाई का जोखिम कम हुआ है।

ईरानी तेल की वापसी

समझौते के तहत ईरान के तेल निर्यात पर लगी कुछ पाबंदियों में राहत मिलने की संभावना है। बाजार को उम्मीद है कि अतिरिक्त ईरानी तेल वैश्विक बाजार में आएगा, जिससे आपूर्ति बढ़ेगी।

बाजार की प्रतिक्रिया

एमओयू की खबर के बाद ब्रेंट क्रूड और WTI दोनों में गिरावट दर्ज की गई। ब्रेंट क्रूड लगभग 79 डॉलर प्रति बैरल के आसपास आ गया। संघर्ष के दौरान कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर चली गई थीं।

भारत पर असर

भारत अपनी जरूरत का अधिकांश कच्चा तेल आयात करता है। इसलिए पेट्रोल और डीजल की कीमतों पर दबाव कम हो सकता है। सरकार का आयात बिल घट सकता है। महंगाई नियंत्रित रखने में मदद मिल सकती है।

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