रांची। पुस्तक ‘राधाकृष्ण की कहानियां’ का लोकार्पण मंगलवार को स्टेशन रोड स्थित प्रभात प्रकाशन के सभागार में हुआ। लेखक संजय कृष्ण ने इस पुस्तक को संपादित किया है। कार्यक्रम की अध्यक्षता लेखक अशोक प्रियदर्शी ने की।
इस अवसर पर अशोक प्रियदर्शी ने कहा कि राधाकृष्ण का क्षेत्रीय भाषाओं के विकास का योगदान बहुत बड़ा है। रांची में राधाकृष्ण को जानने वाले उन्हें लाल बाबू कह कर संबोधित करते थे। रांची में जब भी कोई साहित्यिक कार्यक्रम आयोजित होते थे, तब इसकी अध्यक्षता राधा कृष्ण किया करते थे। उनकी कहानी पढ़ने की कला एकदम अलग थी। उनके जैसे कहानी पढ़ने वाला कोई दूसरा नहीं होगा।
कार्यक्रम में मुख्य वक्ता पद्मश्री बलबीर दत्त ने कहा कि हिंदी साहित्य में राधाकृष्ण योगदान अद्भुत है। राधाकृष्ण जब आकाशवाणी में काम करते थे, तब उन्हें बहुत कम लोग जानते थे। रांची में उन्हें बहुत सम्मान मिला। उनके निधन पर मात्र 10 से 15 लोग ही उपस्थित थे। यह एक साहित्यकार की उपेक्षा है।
जन सूचना पदाधिकारी आनंद कुमार ने कहा कि दुख की जिंदगी में भी राधाकृष्ण ने अद्भुत कहानियां और उपन्यास लिखा। राधाकृष्ण फिल्मों से भी जुड़े रहे। आजादी के बाद वे सरकारी सेवा से जुड़े एवं राष्ट्रनिर्माण में बड़ा योगदान दिया। पंचवर्षीय योजना की शुरुआत हुई, तो उसमें सबसे अधिक आलेख राधाकृष्ण की छपी।
पंकज मित्र ने कहा कि राधाकृष्ण की लेखन में बहुत धार थी। इनकी कहानियां पढ़ेंगें तो पता चलेगा कि समय से आगे की कहानी है। इनकी कहानियां में जीवन और संघर्ष का ताप है। उन्होंने जीवन के संकट को अपने लेखन से दूर रखा। इनकी हास्य व्यंग भी बहुत ही सराहनीय है।
राकेश कुमार सिंह ने कहा कि संजय कृष्ण ने पुस्तक के माध्यम से राधाकृष्ण को जागृत कर दिया है। संजय कृष्ण ने कहा कि राधाकृष्ण के बारे में कई लोगों को जानकारी नहीं है। इनकी कहानियां कम ही चर्चित है। इस पुस्तक के माध्यम से राधाकृष्ण की कहानियों को लोगों तक पहुंचाने का प्रयास है।
मंच का संचालन करते डॉ मयंक मुरारी ने कहा कि कथाएं सभ्यता का निर्माण करती हैं। राधाकृष्ण की कहानियां, हास्य रस, साहित्य समेत कई किताबें लिखी। उन्होंने अपनी शर्तों के साथ जीवन जिया।
प्रभात प्रकाशन के निदेशक राजेश शर्मा ने अतिथियों का स्वागत किया। धन्यवाद हरेंद्र प्रसाद सिन्हा ने दिया। इस अवसर पर राधाकृष्ण के पुत्र सुधीर लाल, प्रमोद झा, नरेंद्र झा, जेपी पांडे समेत अन्य लोग मौजूद थे।
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