लखनउ। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सितंबर, 2025 के बरेली हिंसा मामले में इत्तेहाद-ए-मिलत काउंसिल के प्रमुख मौलाना तौकीर रजा खान की जमानत याचिका खारिज कर दी। अदालत ने ‘सर तन से जुदा’ नारे को लेकर बेहद सख्त और अहम टिप्पणी की है।
जस्टिस आशुतोष श्रीवास्तव की पीठ ने कहा कि ‘गुस्ताख-ए-नबी की एक ही सजा, सर तन से जुदा’ नारे की तुलना “अल्लाहु-अकबर”, “जय श्री राम”, “हर हर महादेव” या “जो बोले सो निहाल, सत श्री अकाल” जैसे नारों से नहीं की जा सकती।
अदालत ने स्पष्ट किया कि बाकी धार्मिक नारे ईश्वर, भगवान या गुरु के प्रति आदर और आस्था प्रकट करते हैं। इसके विपरीत, “सर तन से जुदा” का नारा किसी आस्था का प्रतीक नहीं, बल्कि देश के कानून की व्यवस्था और भारत की संप्रभुता व अखंडता के लिए सीधी चुनौती है।
कोर्ट ने माना कि यह नारा लोगों को उकसाने और हिंसा या सशस्त्र विद्रोह की भावना भड़काने जैसा काम करता है।
बताते चलें कि सितंबर, 2025 में मौलाना तौकीर रजा ने प्रशासन द्वारा अनुमति न दिए जाने और धारा 163 लागू होने के बावजूद समर्थकों से इस्लामिया इंटर कॉलेज में जुमे की नमाज के बाद जुटने का आह्वान किया था। भारी भीड़ ने नारेबाजी करते हुए मार्च निकाला, जहां पुलिस के रोकने पर पथराव, पेट्रोल बम और पुलिसकर्मियों पर हमले की घटनाएं हुईं।
बचाव पक्ष का तर्क था कि तौकीर रजा मौके पर खुद मौजूद नहीं थे, लेकिन हाईकोर्ट ने नोट किया कि उन्होंने ही भीड़ को जुटाया था। हिंसा के बाद आए उनके बयान में भी हिंसा करने वालों की प्रशंसा की गई थी, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
इन सभी तथ्यों और टिप्पणी के आधार पर कोर्ट ने मौलाना तौकीर रजा को जमानत देने से साफ इनकार कर दिया।
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