
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने माकपा की नेता वृंदा करात को झटका लगा है। कोर्ट ने भाजपा नेताओं के खिलाफ डाले गए उनकी पुनर्विचार याचिका को खारिज कर दिया है। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने स्पष्ट रूप से कहा कि उन्हें पिछले फैसले में पुनर्विचार की कोई गुंजाइश या स्पष्ट त्रुटि नजर नहीं आती है।
पुनर्विचार याचिका का आधार
अपनी पुनर्विचार याचिका में वृंदा करात ने तर्क दिया था कि 29 अप्रैल को बीजेपी नेताओं को दी गई क्लीन चिट के फैसले में रिकॉर्ड स्तर पर स्पष्ट त्रुटि है। उनका कहना था कि ना तो ट्रायल कोर्ट और न ही दिल्ली हाईकोर्ट ने उनके द्वारा लगाए गए आरोपों की गुण-दोष के आधार पर जांच की थी।
श्रीमती करात ने यह भी रेखांकित किया था कि अदालत ने यह तो माना था कि एफआईआर दर्ज करने के लिए CrPC की धारा 196 के तहत पूर्व अनुमति की आवश्यकता नहीं है। फिर भी शीर्ष अदालत ने यह निष्कर्ष निकाला कि बयानों से कोई संज्ञेय अपराध नहीं बनता है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इन दलीलों को खारिज कर दिया।
क्या था पूरा विवाद
जनवरी 2020 में नागरिक संशोधन अधिनियम (CAA, 2019) के विरोध में चल रहे प्रदर्शनों के दौरान बीजेपी नेताओं पर नफरत भरे भाषण देने के आरोप लगे थे।
27 जनवरी, 2020 को तत्कालीन केंद्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर पर कथित तौर पर विवादित नारा “देश के गद्दारों को, गोली मारो सालों को” लगाने का आरोप था।
28 जनवरी, 2020 को प्रवेश वर्मा ने कथित तौर पर बयान दिया था कि अगर शाहीन बाग के प्रदर्शनकारियों को नहीं रोका गया, तो वे अंततः “घरों में घुसकर बलात्कार करेंगे और लोगों को मार डालेंगे।”
कानूनी लड़ाई का सफर
माकपा नेता वृंदा करात और केएम तिवारी ने दिल्ली हाईकोर्ट के 22 जून, 2023 के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें दोनों बीजेपी नेताओं के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने से इनकार कर दिया गया था।
निचली अदालत और हाईकोर्ट
दिल्ली हाईकोर्ट ने निचली अदालत (26 अगस्त 2020) के उस फैसले को बरकरार रखा था, जिसमें अभियोजन के लिए पूर्व मंजूरी न होने के कारण आईपीसी की धाराओं 153A, 153B, 295A, 504, 505 और 506 के तहत एफआईआर का आदेश देने से इनकार कर दिया गया था।
सुप्रीम कोर्ट का फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने 29 अप्रैल को माना था कि उनके बयानों से सांप्रदायिक हिंसा या सार्वजनिक व्यवधान नहीं फैला और न ही ये टिप्पणियां किसी विशेष समुदाय के खिलाफ थीं। हालांकि, शीर्ष अदालत ने एफआईआर के लिए ‘पूर्व मंजूरी’ संबंधी हाईकोर्ट के कानूनी तर्क को गलत जरूर ठहराया था, लेकिन कुल मिलाकर राहत नेताओं को ही दी थी।
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