नागपुरी भाषा की विदुषी डॉ कुमारी बसंती नहीं रहीं

झारखंड
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सुजीत कुमार केशरी

पिठोरिया। नागपुरी भाषा की विदुषी, कुशल शिक्षिका,  नारी शक्ति की चिंगारी डॉ कुमारी बासंती का निधन 19 अप्रैल, 2026 को हो गया। उनका दाह संस्कार उनके जन्म स्थान सिमडेगा के रेगाडीह स्थित पोढ़ाटोली गांव में किया गया। डॉ .कुमारी बासंती सिर्फ एक विदुषी लेखिका ही नहीं झारखंड आंदोलनकारी भी थीं।

उन्होंने झारखंड आंदोलन से लेकर जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषाओं के लिए चलाए जाने वाले तमाम आंदोलन में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थीं। झारखण्डी भाषाओं के पठन-पाठन के लिए वे सतत् प्रयासरत रहीं। इतना ही नहीं झारखंड की प्रतियोगिता परीक्षाओं से लेकर लोक सेवा आयोग तक जनजातीय क्षेत्रीय भाषाओं को विषय के रूप में शामिल करवाने में उन का अहम योगदान रहा है।

उन्होंने अपने लेख के माध्यम से झारखंड की सुंदरता,गरिमा रमणीयता, संस्कार  और समन्वित संस्कृति को आईने की तरह झलकाया है। डॉ कुमारी बासंती उर्सलाइन कॉन्वेंट उच्च विद्यालय सामटोली से मैट्रिक की परीक्षा पास की, फिर सिमडेगा कॉलेज से बीए और हिंदी ऑनर्स की डिग्री प्राप्त की।

रांची कॉलेज में 3 जनवरी 1977 को उनकी नियुक्ति नागपुरी की प्राध्यापिका के रूप में हुई। नागपुरी की पहली प्राध्यापिका के रूप में विश्वविद्यालय की ओर से नियुक्त होने का गौरव इन्हें प्राप्त हुआ। मार्च, 1982 में स्थाई रूप से जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा विभाग की प्राध्यापिका बनी। इसी विभाग की विभागाध्यक्ष सितंबर 1999 से मार्च 2011 तक रहीं।

डॉ कुमारी बासंती ने नागपुरी गीतों की छंद -रचना विषय पर शोध करके नागपुरी भाषा की क्षमता, अस्मिता, प्राचीनता और उसके मूल स्रोत तक को उजागर किया है। डॉ .कुमारी बासंती मूल रूप से कहानीकार थी। उनकी हर कहानी झारखंड की सामाजिक और औपनिवेशिक पीड़ा को उजागर करती है।

उन्होंने नागपुरी के काव्य, निबंध साहित्य को भी समृद्धि किया है। डॉ कुमारी कुशल शिक्षिका ही नहीं वह कुशल प्रशासिका भी थीं। वर्ष 1985 से 1996 तक दीपशिखा महिला छात्रावास के रांची की अधिक्षिका भी रहीं।

नागपुरी भाषा परिषद, नागपुरी साहित्य संस्कृति मंच, नागपुरी प्रचारिणी सभा के पदाधिकारी और झारखंड के साहित्यकारों ने उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि दी है ।

नागपुरी भाषा के विभागाध्यक्ष डॉ. उमेश नंद तिवारी ने कहा डॉ .कुमारी वह वासंती शिक्षा और साहित्य जगत के आधार स्तंभ थीं। उन्होंने अपना संपूर्ण जीवन झारखंडियों एवं झारखंडी भाषा साहित्य के कल्याण के लिए अर्पित कर दिया।

उनका आज नहीं रहना संपूर्ण झारखंड के लिए अपूरणीय क्षति है। कुरमाली भाषा के पूर्व विभाग प्राध्यापक डॉ एचएन सिंह ते कहा कि डॉ कुमारी बांसंती का चले जाना एक युग का अंत हो जाना है।

नागपुरी भाषा परिषद की महासचिव डॉ. शकुंतला मिश्र ने कहा कि मैं उनके निधन से निशब्द हूं। मैं अब वह प्रेरणा की चिंगारी जो नई पीढ़ी को रास्ता दिखलाती थी उसकी कमी हम कभी पूरी नहीं कर पाएंगे। डॉ. युगेश कुमार महतो ने कहा कि बरगद का घना छांव आज हट गया है।

नागपुरी के सहायक प्राध्यापक डॉ. रामकुमार ने कहा कि अविवाहित रहकर जिसने अपनी मातृभूमि और मातृभाषा की सेवा की उसकी कृतियों को हम शब्दों में बखान नहीं कर सकते। नागपुरी संस्थान पिठोरिया में भी शोक सभा कर श्रद्धांजलि दी गई।

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