डॉ. मयंक मुरारी की पुस्तक ‘जीवन में अर्थ की खोज’ का लोकार्पण

झारखंड
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  • जितना स्वाभाविक रहेंगे, उतना सत्य के साथ रहेंगे : डॉ. अरुण प्रकाश

रांची। मानव मंदिर मिशन एवं राजकमल प्रकाशन समूह की ओर से लेखक और चिंतक डॉ. मयंक मुरारी की पुस्तक ‘जीवन में अर्थ की खोज’ का लोकार्पण रविवार को नई दिल्ली में आयोजित संगोष्ठी में किया गया। कार्यक्रम में शिक्षा, साहित्य और सामाजिक क्षेत्र से जुड़े वक्ताओं ने आधुनिक जीवन में अर्थ, उद्देश्य, चरित्र निर्माण और नई पीढ़ी की चुनौतियों पर विचार व्यक्त किए।

मानव मंदिर मिशन के महासचिव और दार्शनिक डॉ. अरुण प्रकाश ने कहा कि जीवन और शिक्षा का उद्देश्य केवल रोजगार हासिल करना नहीं हो सकता। आज आवश्यकता इस बात पर विचार करने की है कि मनुष्य अपने जीवन और अपने होने के अर्थ को किस तरह समझता है। उन्होंने कहा, “जितना स्वाभाविक रहेंगे, उतना सत्य के साथ रहेंगे।

मुख्य अतिथि डॉ. अमित कुमार श्रीवास्तव ने कहा कि शिक्षा में अक्सर ‘क्या’ और ‘कैसे’ पर अधिक ध्यान दिया जाता है, जबकि ‘क्यों’ का प्रश्न पीछे छूट जाता है। उन्होंने कहा कि शिक्षा का उद्देश्य केवल जानकारी देना नहीं, बल्कि जिज्ञासा और समझ विकसित करना भी है। व्यक्ति अपने कार्य से संतोष प्राप्त करने के साथ दूसरों की खुशी और सफलता में योगदान देकर भी जीवन को सार्थक बना सकता है।

पुरुषोत्तम प्रतीक ने कहा कि जीवन का लक्ष्य केवल उपलब्धियां हासिल करना नहीं, बल्कि चरित्र का विकास करना भी है। मनुष्य को कर्म करते हुए लगातार बेहतर बनने का प्रयास करना चाहिए। व्यक्ति के कर्म ही अंततः उसके जीवन की पहचान बनते हैं।

सीमा त्यागी ने कहा कि ‘जीवन में अर्थ की खोज’ डॉ. मयंक मुरारी की रचनात्मक यात्रा के साथ समाज और आधुनिक जीवन से जुड़े प्रश्नों को भी सामने लाती है। नई पीढ़ी के लिए चुनौती यह है कि वह समय के साथ आगे बढ़ते हुए अपने जीवन के मूल प्रश्नों से भी जुड़ी रहे। उन्होंने बताया कि पुस्तक को सात खंडों में विभाजित किया गया है, जिनमें जीवन के विभिन्न आयामों पर विचार किया गया है।

कार्यक्रम के आरंभ में राजकमल प्रकाशन के निदेशक अमोघ महेश्वरी ने अतिथियों का स्वागत किया। उन्होंने पुस्तक को समकालीन जीवन में मनुष्य के सामने उपस्थित बुनियादी प्रश्नों पर संवाद की एक पहल बताया।

संगोष्ठी में वक्ताओं ने कहा कि आधुनिक जीवन में सुविधाओं और उपलब्धियों का विस्तार हुआ है, लेकिन जीवन के उद्देश्य पर ठहरकर विचार करने का अवसर कम हुआ है। ऐसे समय में ‘जीवन में अर्थ की खोज’ व्यक्ति को अपने भीतर लौटकर यह प्रश्न पूछने के लिए प्रेरित करती है कि वह जो कर रहा है, आखिर क्यों कर रहा है।

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