- सर्वोच्च न्यायालय में क्यूरेटिव पिटीशन जल्द दायर की जाएगी
रांची। निःशुल्क और अनिवार्य बाल शिक्षा अधिकार अधिनियम के तहत एनसीटीई द्वारा शिक्षकों की नियुक्ति के लिए न्यूनतम योग्यता निर्धारण वर्ष 2010 से पूर्व के नियुक्त शिक्षकों को भी शिक्षक पात्रता परीक्षा (टेट) उत्तीर्ण करने को सुप्रीम कोर्ट ने अनिवार्य कर दिया है। पास नहीं करने पर सेवा से मुक्त कर दिया जाएगा।
इस आदेश से झारखंड के लगभग 25 हजार शिक्षकों में असंतोष है। शिक्षकों ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले को संसद की शक्तियों से परे करार देते आपत्ति जताई है। अखिल झारखंड प्राथमिक शिक्षक संघ की रविवार देर शाम हुई राज्य कार्यकारिणी की वर्चुअल मीटिंग में इस विषय पर गंभीर चर्चा की गई।
निर्णय लिया गया कि टीचर्स फेडरेशन ऑफ इंडिया के नेतृत्व में राष्ट्र स्तर पर केंद्र सरकार के समक्ष यह मांग की जाएगी कि आगामी मानसून सत्र में सरकार आरटीई एक्ट में संशोधन करें। एनसीटीई के 2010 की अधिसूचना के सभी प्रावधानों को आरटीई एक्ट में अंकित करें, ताकि सुप्रीम कोर्ट के फैसले से उत्पन्न राष्ट्रीय शिक्षक असंतोष का समाधान हो सके।
साथ ही, संसद की शक्तियों से निर्गत एनसीटीई की 2010 की अधिसूचना सर्वव्यापी हो सके। इसके लिए अखिल झारखंड प्राथमिक शिक्षक संघ और टीचर्स फेडरेशन ऑफ इंडिया जल्द ही भारत सरकार के मंत्रियों को निवेदन पत्र सौंपेगा।
इसके साथ ही न्यायिक संघर्ष में सुप्रीम कोर्ट में एक क्यूरेटिव पिटीशन दायर करने पर भी सहमति बनी। इधर, सुप्रीम कोर्ट के वर्तमान न्यायादेश के अनुपालन के नाम पर राज्य के लगभग 25 हजार शिक्षकों को सामान्य झारखंड टेट की परीक्षा में शामिल कराने की विभागीय तैयारी का अखिल झारखंड प्राथमिक शिक्षक संघ ने विरोध किया है।
संघ का कहना है कि कोर्ट के आदेश के अनुसार प्रत्येक छह माह पर कार्यरत शिक्षकों के लिए विशेष रूप से टीईटी की परीक्षा आयोजित करनी है, ना कि सीधी नियुक्ति के अभ्यर्थियों के साथ होने वाली सामान्य टीईटी परीक्षा में कार्यरत शिक्षकों को अनावश्यक रूप से शामिल कराना है।
संघ के प्रदेश अध्यक्ष अनूप केसरी, महासचिव राम मूर्ति ठाकुर, उपाध्यक्ष दीपक दत्ता, संगठन महामंत्री असादुल्लाह, कोषाध्यक्ष संतोष कुमार आदि ने कहा है राज्य सरकार को कार्यरत शिक्षकों के लिए टीईटी परीक्षा आयोजित करने में जल्दबाजी में कोई अनापेक्षित निर्णय नहीं लेना चाहिए।
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