- भारत को मक्का अनुसंधान और विकास का वैश्विक केंद्र बनायें वैज्ञानिक : डॉ एमएल जाट
रांची। भारत सरकार के कृषि अनुसंधान एवं शिक्षा विभाग के सचिव और आइसीएआर के महानिदेशक डॉ मांगी लाल जाट ने भारत को मक्का अनुसंधान, विकास, उत्पादन और नवाचार का वैश्विक केंद्र बनाने के लिए कमर कसने का आह्वान वैज्ञानिकों से किया है। इसके लिए उन्होंने अच्छे डेटा इको सिस्टम के विकास, विभिन्न शोध संस्थानों के प्रयासों के कन्वर्जेन्स और प्राइवेट-पब्लिक भागीदारी बढाने पर जोर दिया।
डॉ जाट वृहस्पतिवार को बिरसा कृषि विश्वविद्यालय (बीएयू) में आयोजित मक्का संबंधी अखिल भारतीय समन्वित अनुसंधान परियोजना की 69वीं वार्षिक कार्यशाला को संबोधित कर रहे थे। आंकड़ों को ज्यादा व्यवस्थित ढंग से संग्रहीत करने पर जोर देते हुए उन्होंने कहा कि डेटा का इस्तेमाल सटीक पूर्वानुमान के लिए किया जाना चाहिए न कि प्रयासों और परिणामों के पोस्टमार्टम के लिए।
डॉ जाट ने कहा की पोषक तत्वों की उपलब्धता असीमित नहीं है, इसलिए इन्हें ज्यादा प्रभावी इस्तेमाल करनेवाले प्रभेदों के विकास पर शोध प्रयास केन्द्रित करना चाहिएI मानव पूंजी के विकास में ज्यादा विनियोग करने पर जोर देते हुए उन्होंने कहा कि प्रक्षिक्षण, जानकारी और अनुभव के लिए वैज्ञानिकों को देश-दुनिया के सर्वोत्तम प्रयोगशालाओं में भेजा जाना चाहिए।
आइसीएआर के उप महानिदेशक (फसल विज्ञान) डॉ डीके यादव ने कहा कि देश में मक्का की प्रति हेक्टेयर उत्पादकता वर्ष 2014-15 में 2567 किलो थी, जो में बढ़कर 2024-25 में 3590 किलो हो गयी। हमने वर्ष 2030-31 तक इसे बढ़ाकर 4100 किलो तक करने का लक्ष्य रखा हैI हालांकि, वैश्विक औसत उत्पाकता (6000 किलो प्रति हेक्टेयर) से यह अब भी बहुत कम है।
ब्राजील में भी, जहां कृषि मौसम परिस्थितियां भारत जैसी ही हैं, उत्पादकता 5500 किलो है। देश में पिछले 11 सालों में 315 हाइब्रिड प्रभेदों (स्वीट कॉर्न, पॉप कॉर्न, बेबी कॉर्न, बायो फ्यूल पर्पस, बायोफोर्टीफायड किस्में मिलाकर) का विकास किया गया है। इनमें 113 का श्रेय प्राइवेट सेक्टर को तथा 202 का श्रेय सरकारी क्षेत्र को जाता है।
बीएयू के कुलपति डॉ एससी दुबे ने कहा कि झारखंड-बिहार में मक्का की उत्पादकता और क्षेत्र में वृद्धि की पर्याप्त संभावनाएं हैं। झारखंड में मक्का की प्रति हेक्टेयर उत्पादकता 2.4 टन है, जबकि राष्ट्रीय औसत लगभग 3.5 टन है। उन्होंने 15 प्रतिशत से अधिक प्रोटीन वाले किस्मों के विकास, रोगों-कीड़ों से बचाव के लिए क्वारेंटाइन सुविधाओं के सुदृढ़ीकरण और बीज उत्पादन विस्तार कार्यों के लिए निजी क्षेत्र के साथ सहयोग वृद्धि पर जोर दिया।
आइसीएआर के सहायक महानिदेशक (खाद्य एवं चारा फसलें) डॉ एसके प्रधान ने कहा कि दुनिया में अनाज उत्पादन में मक्का का सर्वोच्च स्थान है। नवीनतम आंकड़ों के अनुसार दुनिया में वर्ष में मक्का 1299 मिलियन टन, गेहूं 740 मिलियन टन तथा चावल 540 मिलियन टन उगाया गया। उन्होंने वर्षाश्रित क्षेत्रों में उत्पादकता बढाने और चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों के लिए क्लाइमेट-रेडी प्रभेद विकसित करने पर जोर दिया।
भारतीय मक्का अनुसंधान संस्थान, लुधियाना के निदेशक डॉ एचएस जाट ने स्वागत भाषण करते हुए गत वर्ष का प्रगति प्रतिवेदन प्रस्तुत किया। कहा कि देश में प्रयुक्त होनेवाले एथनाल का 40 प्रतिशत भाग मक्का से प्राप्त होता है।
कार्यशाला में देश के 37 कृषि विश्वविद्यालयों और आइसीएआर संस्थानों के 250 से अधिक वैज्ञानिक भाग ले रहे हैं। इस अवसर पर नवोन्मेषी कृषि और उससे किसानों को जोड़कर उनकी उत्पादकता और आय बढाने के लिये दो प्रगतिशील किसानों- चोरेया (चान्हो प्रखंड) के नंदकिशोर साहू और रांची के अभिषेक मिश्र को सम्मानित किया गया।
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