चैनपुर (गुमला)। सरकार ‘जल-जंगल-जमीन’ के संरक्षण का ढिंढोरा पीट रही है। हालांकि गुमला जिले के चैनपुर प्रखंड के कुरूमगाड़ वन क्षेत्र में माफिया और स्थानीय लोग मिलकर प्रकृति ‘जलावन’ के नाम सखुआ का सफाया कर रहे हैं।
ताजा मामला चित्तरपुर और कोरवा टोली का है। यहां जलावन की आड़ में बेशकीमती सखुआ (साल) के हरे-भरे पेड़ों पर कुल्हाड़ी चल रही हैं। क्षेत्र में लकड़ी कटाई का खेल बड़े शातिर तरीके से खेला जा रहा है।
जानकारी के अनुसार, लकड़ी काटने वाले लोग अक्सर जमीन को ‘रैयती’ बताकर वन विभाग की कार्रवाई से बचने की कोशिश करते हैं। हालांकि, सरकारी नियमों के मुताबिक निजी जमीन पर भी सखुआ जैसे कीमती पेड़ों को काटने के लिए वन विभाग से विधिवत अनुमति लेना अनिवार्य है। बिना परमिट के हो रही कटाई सीधे तौर पर कानून का उल्लंघन है।
चित्तरपुर निवासी हेनरी तिग्गा ने पूछताछ में स्वीकार किया कि उन्होंने भारी संख्या में सखुआ के छोटे पेड़ों की कटाई की है। उनके द्वारा दिए गए तर्क चौंकाने वाले हैं। उन्होंने बताया कि लकड़ियां बारिश के मौसम में जलावन के लिए स्टॉक की जा रही थीं।
स्वीकार किया कि उनके पास पेड़ काटने का कोई आधिकारिक सरकारी परमिट या लिखित अनुमति पत्र नहीं है। उन्होंने जमीन को अपनी निजी संपत्ति बताते हुए कहा कि वे इसकी मालगुजारी भरते हैं, इसलिए उन्हें पेड़ काटने का हक है।
यह पहली बार नहीं है जब कुरूमगाड़ में वन संपदा को नुकसान पहुंचाया गया हो। कुछ समय पूर्व छतरपुर में भी सड़क किनारे पेड़ों की अवैध कटाई हुई थी, लेकिन मामला केवल ‘जांच’ तक ही सीमित रह गया। प्रशासन और वन विभाग की इस शिथिलता के कारण लकड़ी माफियाओं के हौसले बुलंद हैं।
ग्रामीणों ने चिंता जाहिर की। कहा कि यदि इसी रफ्तार से सखुआ के पेड़ कटते रहे, तो न केवल हरियाली खत्म होगी, बल्कि जंगली जानवरों का पलायन बस्तियों की ओर शुरू हो जाएगा। इससे मानव-वन्यजीव संघर्ष की स्थिति पैदा होगी। जलावन की आड़ में हरे पेड़ों की बलि देना पर्यावरण के साथ बड़ा खिलवाड़ है।
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