मंदिर की जमीन पर सुप्रीम कोर्ट ने द‍िया ये ऐतिहासिक फैसला

नई दिल्ली देश
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नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने मंदिर की जमीनों को लेकर एक मील का पत्थर साबित होने वाला ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। सर्वोच्च अदालत ने स्पष्ट रूप से कहा है कि मंदिर की संपत्ति का वास्तविक मालिक उसमें विराजमान देवता होते हैं, सरकार नहीं। अदालत ने राज्य सरकार को स्पष्ट संदेश दिया है कि वह मंदिर संपत्तियों की केवल संरक्षक है, उसकी मालिक नहीं।

सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु सरकार को हस्तांतरित किए गए एक मंदिर की ‘इनाम भूमि’ के गिफ्ट डीड को ‘शून्य और अमान्य’ करार देते हुए रद्द कर दिया। कोर्ट ने अपने आदेश में सख्त रुख अपनाते हुए कहा कि मंदिर संपत्ति की सुरक्षा और उसका प्रशासन केवल और केवल कानून के अनुसार ही होना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट ने 8 मार्च, 2019 से लागू करते हुए हर महीने ₹31,000 का बकाया किराया चुकाने का आदेश दिया है। राज्य सरकार को आदेश दिया गया है कि वह मंदिर को ₹1 लाख का कानूनी खर्च/लागत अदा करे। मंदिर की ज़मीन के सभी लंबित किराए के बकाए को तुरंत चुकाने का निर्देश दिया गया है।

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले ने देश भर में फैले मंदिर संपत्तियों और ट्रस्टों के अधिकार क्षेत्र पर बड़ा कानूनी रुख साफ कर दिया है। अदालत के इस निर्णय से यह साफ हो गया है कि कोई भी सरकार या संस्था मंदिर की संपत्तियों को मनमाने ढंग से न तो अपने नाम कर सकती है और न ही उसका दुरुपयोग कर सकती है।

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