
रांची। भाजपा के राष्ट्रीय मंत्री एवं राज्यसभा सांसद डॉ. प्रदीप कुमार वर्मा ने लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के आदिवासी एकता महाजुटान में भेजे संदेश पर पलटवार किया। उन्होंने कहा कि संविधान का अनुच्छेद 332(3) स्पष्ट रूप से कहता है कि किसी राज्य की विधानसभा में अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित सीटों की संख्या उनकी जनसंख्या के अनुपात के अनुरूप होगी। फिर किस आधार पर यह भ्रम फैलाया जा रहा है कि भाजपा ने झारखंड की आदिवासी सीटें घटाने का कोई फैसला कर लिया है?
आज की तारीख में झारखंड के लिए न कोई नया परिसीमन ड्राफ्ट आया है, ना निर्वाचन आयोग ने 28 ST सीटें घटाने का कोई प्रस्ताव जारी किया है। निर्वाचन आयोग स्वयं स्पष्ट करता है कि अगला सामान्य परिसीमन 2026 के बाद होने वाली पहली जनगणना के प्रकाशित आंकड़ों के बाद संवैधानिक प्रक्रिया के अनुसार होगा।

राहुल गांधी को वास्तव में आदिवासी अस्तित्व की चिंता है, तो केवल सीटों की राजनीति नहीं करें। आदिवासी आबादी क्यों घट रही है, इसका भी जवाब खोजें। केंद्र सरकार ने झारखंड हाईकोर्ट में दाखिल हलफनामे में, Registrar General of India से सत्यापित आंकड़ों के आधार पर बताया कि संथाल परगना में अनुसूचित जनजातियों की हिस्सेदारी 1951 के 44.67 प्रतिशत से घटकर 2011 में 28.11 प्रतिशत रह गई। उसी हलफनामे में साहिबगंज और पाकुड़ के रास्ते घुसपैठ होने का आकलन दर्ज है। पलायन, कम जन्मदर, ईसाई धर्मांतरण सहित अन्य कारणों की भी जांच की आवश्यकता बताई गई है।
राहुल गांधी को केवल आदिवासी की सीट की चिंता है या आदिवासी की घटती आबादी, उसकी जमीन और उसके अस्तित्व की भी चिंता है?
पांचवीं अनुसूची, PESA और वन अधिकार कानून किसी राजनीतिक दल की जागीर नहीं हैं। ये भारत के संविधान और कानून द्वारा आदिवासी समाज को मिले अधिकार हैं। उनकी रक्षा करना हम सबकी संवैधानिक जिम्मेदारी है।
आदिवासी समाज को काल्पनिक भय दिखाकर राजनीतिक रोटी सेंकने के बजाय कांग्रेस को बताना चाहिए कि संथाल परगना की बदलती जनसांख्यिकी, आदिवासी जमीन की सुरक्षा, पलायन और अवैध घुसपैठ जैसे गंभीर प्रश्नों पर वह मौन क्यों है।
डॉ वर्मा ने कहा कि परिसीमन संविधान से होगा, किसी पार्टी के डर और दुष्प्रचार से नहीं। आदिवासी समाज को डर नहीं—अपनी जमीन, अपनी पहचान और अपने संवैधानिक अधिकारों की वास्तविक सुरक्षा चाहिए।”
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