बाल संरक्षण एवं दिव्यांगता पर क्षमता निर्माण प्रशिक्षण शिविर आयोजित

झारखंड
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  • मिशन वात्सल्य के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए कार्ययोजना बनाने का निर्देश

रांची। झारखंड में बाल संरक्षण तंत्र को सशक्त बनाने और समावेशी देखभाल को बढ़ावा देने के लिए ‘बाल संरक्षण एवं दिव्यांगता की समझ’ विषयक प्रशिक्षण का आयोजन किया गया। सामाजिक सुरक्षा के सहायक निदेशकों के लिए क्षमता निर्माण प्रशिक्षण 9 से 11 अप्रैल तक किया गया। इस कार्यक्रम का आयोजन झारखंड स्टेट चाइल्ड प्रोटेक्शन सोसाइटी ने यूनिसेफ (झारखंड) और केएचएसआईए के सहयोग से किया।

झारखंड स्टेट चाइल्ड प्रोटेक्शन सोसाइटी के निदेशक विजय सिन्हा ने कहा कि मिशन वात्सल्य के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए खामियों की पहचान कर ठोस कार्ययोजना तैयार कर राज्य सरकार के साथ साझा करना आवश्यक है।

यूनिसेफ झारखंड की फील्ड ऑफिस प्रमुख डॉ. कनिनिका मित्रा ने बाल संरक्षण से जुड़े जटिल मुद्दों से निपटने में संवेदनशीलता और समयबद्धता के महत्व पर बल दिया। उन्होंने कहा कि जिला स्तर पर क्षमता निर्माण अत्यंत जरूरी है, ताकि कोई भी बच्चा पीछे न छूटे। समावेशी बाल संरक्षण विकल्प नहीं, बल्कि अनिवार्यता है।

यूनिसेफ की चाइल्ड प्रोटेक्शन स्पेशलिस्ट सुश्री प्रीति श्रीवास्तव और केएचएसआइए की सुश्री संगीता भाटिया ने प्रशिक्षण की पृष्ठभूमि प्रस्तुत करते हुए इसके उद्देश्यों पर प्रकाश डाला।

तीन दिनों के दौरान प्रतिभागियों ने बाल संरक्षण एवं जेजे अधिनियम, मिशन वात्सल्य, देखभाल एवं संरक्षण के संदर्भ में दिव्यांग बच्चों की स्थिति, फोस्टर केयर, स्पॉन्सरशिप और आफ्टरकेयर जैसे परिवार-आधारित देखभाल तंत्र, बाल यौन शोषण एवं पॉक्सो अधिनियम, बाल विवाह और पीसीएमए 2006 के तहत बाल विवाह निषेध अधिकारियों की भूमिका जैसे विषयों पर सत्रों में भाग लिया। विशेषज्ञों ने संस्थागत देखभाल से बाहर लाने और परिवार-आधारित विकल्पों को सुदृढ़ करने के महत्व पर जोर दिया।

कार्यक्रम में बाल संरक्षण के संदर्भ में दिव्यांगता के समावेशन पर विशेष ध्यान दिया गया। सत्रों में दिव्यांगता की अवधारणाओं, मिथकों और सामाजिक पूर्वाग्रहों को संबोधित करते हुए चिकित्सा मॉडल से अधिकार-आधारित और सामाजिक मॉडल की ओर बदलाव पर बल दिया गया।

विशेष सत्रों में दिव्यांगता और बाल संरक्षण के अंतर्संबंध, दिव्यांगता के प्रकार, दिव्यांग बच्चों के सामने आने वाली चुनौतियां, बधिर बच्चों में भाषा अभाव  पर व्यावहारिक मार्गदर्शन, शीघ्र पहचान और संचार के महत्व, भारतीय सांकेतिक भाषा सीखने की आवश्यकता, समावेशी शिक्षा, पहचान एवं रेफरल प्रणाली, यूडीआईडी  कार्ड जैसी सुविधाओं तक पहुंच पर चर्चा की गई।

प्रतिभागियों को जुवेनाइल जस्टिस प्रणाली के अंतर्गत बाल संरक्षण प्रणाली सुदृढ़ीकरण के मानक और दिव्यांगता-संवेदनशील केस मैनेजमेंट टूल्स से भी परिचित कराया गया।

इस प्रशिक्षण में नेशनल एसोसिएशन ऑफ द डेफ की विशेषज्ञ सुश्री रितु पांडा, आस्था के राकेश कुमार, केएच एस की निदेशक शबीना बानो, इंक्लूसिव डेवलपमेंट एंड एंगेजमेंट की निदेशक डोरोडी शर्मा, सुश्री संगीता भाटिया, जेएससीपीएस के कंसल्टेंट श्री शरद, यूनिसेफ झारखंड की चाइल्ड प्रोटेक्शन विशेषज्ञ प्रीति श्रीवास्तव तथा यूएनवीए गौरव ने रिसोर्स पर्सन के रूप में सहभागिता की।

समापन सत्र में डीडब्ल्यूसीडी के उप सचिव विकास ने कार्यक्रम के समयबद्ध क्रियान्वयन और व्यय की नियमित निगरानी के महत्व पर जोर दिया। उन्होंने जिला अधिकारियों को निर्देश दिया कि वे जिलों में फोस्टर केयर और आफ्टरकेयर की कवरेज बढ़ाने पर विशेष ध्यान दें।

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