पानुरी ने खोरठा को बोली से साहित्यिक भाषा के रूप में स्थापित किया

झारखंड
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  • रांची विश्वविद्यालय के खोरठा विभाग में मनाया गया श्रीनिवास पानुरी का स्मृति दिवस

सुजीत कुमार केशरी

पिठोरिया। खोरठा के महान साहित्यकार एवं आधुनिक खोरठा साहित्य के अग्रदूत श्रीनिवास पानुरी के स्मृति दिवस पर रांची विश्वविद्यालय के खोरठा विभाग में श्रद्धांजलि कार्यक्रम आयोजित किया गया। विभागीय कक्ष में आयोजित कार्यक्रम में शिक्षकों, शोधार्थियों एवं विद्यार्थियों ने दिवंगत पानुरी के चित्र पर श्रद्धासुमन अर्पित करते हुए खोरठा भाषा-साहित्य के विकास में उनके योगदान को याद किया।

कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए विभागाध्यक्ष डॉ. कुमारी शशि ने कहा कि श्रीनिवास पानुरी आधुनिक खोरठा साहित्य के अग्रदूत थे। उन्होंने अपना पूरा जीवन खोरठा भाषा और साहित्य के विकास के लिए समर्पित कर दिया। आज खोरठा जिस मुकाम पर पहुंची है, उसमें पानुरी का योगदान सर्वाधिक महत्वपूर्ण और आधारभूत है। उनके कार्यों और साहित्य से प्रेरणा लेकर खोरठा के विकास को और गति देने की आवश्यकता है।

विभाग की प्राध्यापिका डॉ. अर्चना कुमारी ने श्रीनिवास पानुरी को खोरठा का महान पुरोधा बताते हुए कहा कि यदि पानुरी जी नहीं होते तो संभव है कि खोरठा गांव-देहात की बोलचाल तक सीमित रह जाती। उन्होंने कहा कि पानुरी के प्रयासों ने खोरठा को साहित्यिक पहचान दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। आज खोरठा के शिक्षक और विद्यार्थी जिस शैक्षणिक परिदृश्य में कार्य कर रहे हैं, उसकी नींव रखने वालों में पानुरी जी का स्थान सर्वोपरि है।

विभाग के शिक्षक एवं खोरठा साहित्यकार डॉ. दिनेश दिनमणि ने श्रीनिवास पानुरी को “खोरठा का महानायक” बताते हुए कहा कि पानुरी ने खोरठा भाषा-साहित्य को दिशा, स्वर और पहचान देने का ऐतिहासिक कार्य किया। उनके साहित्य और भाषा के प्रति समर्पण ने आने वाली पीढ़ियों के लिए मार्ग प्रशस्त किया है।

विभाग के सहायक प्राध्यापक नकुल कुमार ने पानुरी को “आधुनिक खोरठा का जनक” बताते हुए कहा कि खोरठा साहित्य के विकास और उसके सुदृढ़ आधार निर्माण में उनका योगदान अविस्मरणीय है।

इस अवसर पर विभाग के शोधार्थियों एवं विद्यार्थियों ने भी श्रीनिवास पानुरी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर अपने विचार व्यक्त किए। वक्ताओं ने कहा कि पानुरी जी की साहित्यिक साधना आज भी खोरठा की नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा का स्रोत है। कार्यक्रम में उनके साहित्य और भाषा-सेवा को आगे बढ़ाने का संकल्प भी व्यक्त किया गया।

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