झारखंड में पुष्प उत्पादन की अपार संभावनाएं : डॉ एससी दुबे

झारखंड कृषि
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  • बीएयू में प्रसार शिक्षा परिषद की 40वीं बैठक

रांची। बिरसा कृषि विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ एससी दुबे ने कहा है कि झारखंड में पुष्प उत्पादन और उससे संबंधित उद्यम की अपार संभावनाएं हैं। इनका दोहन करने के लिए प्रसार कार्यकर्ताओं और किसानों को कमर कसनी चाहिए। वे शनिवार को बिरसा कृषि विश्वविद्यालय के प्रसार शिक्षा परिषद की 40वीं बैठक को संबोधित कर रहे थे।

डॉ दुबे ने कहा कि झारखंड की मिट्टी एवं आवोहवा में सालों भर फूलों का उत्पादन किया जा सकता है क्योंकि यहां बाढ़, जल जमाव जैसी समस्या नहीं है। कोलकाता नजदीक होने के कारण बड़ा बाजार भी उपलब्ध है। उन्होंने भंडारण, प्रशीतन, बाय बैक और परिवहन सुविधाओं का लाभ उठाने के लिए ज्यादा से ज्यादा संस्थाओं और एजेंसियों से लिंकेज विकसित करने पर बल दिया।

कुलपति ने कहा कि प्रसार वैज्ञानिकों को विकसित प्रौद्योगिकी का परिष्करण और प्रमाणीकरण करते हुए उसे धरातल पर उतारने के लिए किसानों को प्रेरित, प्रोत्साहित करना होता है, इसलिए उनका कार्य ज्यादा चुनौतीपूर्ण है। डॉ दुबे ने प्रत्येक कृषि विज्ञान केंद्र में डाटा की डिपॉजिटरी विकसित करने का सुझाव दिया। उन्होंने कहा कि उत्पादन लागत घटाकर और कृषि उत्पादों का मूल्य संवर्धन कर किसानों की आय 50% तक बढ़ाई जा सकती है।

बैठक के वाह्य विशेषज्ञ नेशनल सीड एसोसिएशन ऑफ़ इंडिया, नई दिल्ली के तकनीकी सलाहकार और कृषि मंत्रालय, भारत सरकार के पूर्व प्रसार निदेशक डॉ आरके त्रिपाठी ने कहा कि देश के युवा कृषि से विमुख हो रहे हैं और प्रोफेशन के रूप में खेती-बाड़ी उनकी प्राथमिकता में सबसे नीचे है। कृषि व्यवसाय और स्टार्टअप जैसे क्षेत्र की उपयोगिता और लाभप्रदता बताते हुए उन्हें कृषि की ओर आकर्षित करने और इसमें बनाए रखने के लिए प्रसार तंत्र को प्रभावी प्रयास करना होगा।

डॉ त्रिपाठी ने कहा कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता के बढ़ते प्रयोग के इस दौर में भी कृषि क्षेत्र में मानवीय हस्तक्षेप का महत्व हमेशा बना रहेगा। प्रसार वैज्ञानिक और कार्यकर्ता फील्ड में काम बहुत करते हैं किंतु उसका समुचित अनुश्रवण और मूल्यांकन नहीं करते, जिसपर ध्यान देने की जरूरत है। 

आईसीएआर के कृषि प्रौद्योगिकी अनुप्रयोग अनुसंधान संस्थान, पटना के प्रधान वैज्ञानिक डॉ डीबी सिंह ने कहा कि देश के लगभग 75 कृषि विश्वविद्यालयों और 113 शोध संस्थाओं द्वारा विकसित तकनीक को किसानों तक पहुंचाने की मुख्य जिम्मेदारी जिला स्तर पर स्थापित कृषि विज्ञान केन्द्रों की है।

गत वर्ष खेत बचाओ अभियान के तहत झारखंड के 23 कृषि विज्ञान केन्द्रों के वैज्ञानिक 1000 से ज्यादा गांव में पहुंचे और एक लाख 3 हजार किसानों से संपर्क किया। कृषि और संबद्ध क्षेत्र से संबंधित तकनीकी परामर्श प्राप्त करने के लिए किसान साथी पोर्टल पर देश के 2.7 करोड़ किसान पंजीकृत है जिनमें से 9.9 लाख किसान झारखंड के हैं।

प्रसार शिक्षा निदेशक डॉ डीके शाही ने स्वागत भाषण करते हुए कहा कि झारखंड में कृषि उत्पादकता और ग्रामीण आजीविका समृद्धि बढ़ाने में प्रसारविदों का महत्वपूर्ण योगदान है। उन्होंने कहा कि राज्य के कृषि विज्ञान केन्द्रों द्वारा पिछले वित्तीय वर्ष में 1622 प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किए गए जिनके माध्यम से लगभग 59000 किसान और प्रसार कार्यकर्ता लाभान्वित हुए। अन्य प्रसार कार्यक्रमों से 8.42 लाख किसान लाभान्वित हुए। इसी प्रकार पशु चिकित्सा महाविद्यालय में 15 हजार से अधिक बीमार पशुओं की चिकित्सा एवं सर्जरी की गई।

डॉ रंजय कुमार सिंह ने कृत कार्य प्रतिवेदन प्रस्तुत किया। अपर निदेशक प्रसार शिक्षा डॉ निरंजन लाल ने धन्यवाद किया। इस अवसर पर प्राकृतिक खेती के लिए अनगड़ा के संतोष बेदिया, डेयरी के क्षेत्र में बुढ़मू के फलिन्द्र महतो, फार्मर्स प्रोड्यूसर कंपनी चलाने के लिए भरनो, गुमला के देवीचरण गोप को नवोन्मेषी किसान के रूप में सम्मानित किया गया।

बैठक में पूर्व कुलपति डॉ जीएस दुबे, पौधा प्रजनन एवं आनुवंशिकी विभाग के पूर्व अध्यक्ष डॉ जेडए हैदर, मृदा विज्ञान विभाग के पूर्व अध्यक्ष डॉ बीपी सिंह, आईसीएआर शोध संस्थान, पलाण्डु के प्रधान डॉ अवनी कुमार सिंह, भारतीय कृषि जैवप्रौद्योगिकी संस्थान के संयुक्त निदेशक डॉ वीपी भडाना तथा निसा के प्रधान वैज्ञानिक डॉ ज्योतिर्मय घोष भी उपस्थित थे।

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