- मातृभाषा और लोक-साहित्य के संरक्षण पर दिया गया जोर
पिठोरिया। राधा गोविन्द विश्वविद्यालय के खोरठा विभाग ने खोरठा साहित्य के अग्रदूत, प्रख्यात साहित्यकार गोविन्द महतो ‘जंगली’ की 81वीं जयंती श्रद्धा के साथ मनाई। कार्यक्रम की शुरुआत उनके चित्र पर माल्यार्पण कर श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए की गई।
इसके बाद खोरठा विभागाध्यक्ष ओहदार अनाम द्वारा स्वागत करते हुए कहा कि गोविन्द महतो ‘जंगली’ ने खोरठा भाषा और साहित्य को सामाजिक सम्मान दिलाने के लिए आजीवन संघर्ष किया। उनका साहित्य खोरठा समाज की चेतना और अस्मिता का प्रतिनिधित्व करता है।
कार्यक्रम को संबोधित करते हुए विश्वविद्यालय के कुलाधिपति बी.एन. साह ने कहा कि गोविन्द महतो ‘जंगली’ खोरठा भाषा के सच्चे साधक थे। उन्होंने अपने लेखन और सामाजिक कार्यों के माध्यम से मातृभाषा को पहचान दिलाई। उनका जीवन नई पीढ़ी के लिए प्रेरणास्रोत है।
सचिव प्रियंका कुमारी ने कहा कि जंगली जी ने खोरठा भाषा को केवल साहित्य तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसे आमजन के जीवन से जोड़ा। खोरठा विभाग उनके साहित्यिक योगदान को विद्यार्थियों तक पहुंचाने का कार्य निरंतर कर रहा है।
विश्वविद्यालय की कुलपति प्रो. (डॉ.) रश्मि ने कहा कि मातृभाषा में शिक्षा और शोध किसी भी भाषा के संरक्षण का सशक्त माध्यम है। गोविन्द महतो ‘जंगली’ का संघर्ष खोरठा भाषा के अकादमिक विकास के लिए मार्गदर्शक है।
कुलसचिव डॉ. निर्मल कुमार मंडल ने कहा कि जंगली जी का साहित्य ग्रामीण जीवन, संस्कृति और सामाजिक सरोकारों का सजीव दस्तावेज है। उनका योगदान साहित्य के साथ-साथ सांस्कृतिक आंदोलन के रूप में भी देखा जाता है।
लेखा पदाधिकारी डॉ. संजय कुमार ने अपने वक्तव्य में कहा कि किसी भी भाषा और संस्कृति के संरक्षण के लिए संस्थागत सहयोग आवश्यक है। गोविन्द महतो ‘जंगली’ जैसे साहित्यकारों का योगदान आने वाली पीढ़ियों के लिए अमूल्य धरोहर है, जिसे संरक्षित और प्रचारित किया जाना चाहिए।
परीक्षा नियंत्रक अशोक कुमार ने कहा कि लोकभाषाओं को शैक्षणिक मंच प्रदान करना आज की आवश्यकता है। गोविन्द महतो ‘जंगली’ के प्रयासों का ही परिणाम है कि आज खोरठा भाषा विश्वविद्यालय स्तर पर अध्ययन का विषय बनी है।
कार्यक्रम के अंत में खोरठा भाषा और साहित्य के संरक्षण-संवर्धन के लिए निरंतर कार्य करने का संकल्प लिया गया। कार्यक्रम में शिक्षक, छात्र एवं साहित्यप्रेमी बड़ी संख्या में उपस्थित रहे।
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