रामगढ़ जिले में प्रदूषण पर बहस तेज: एक ही इकाई जिम्मेदार नहीं

झारखंड
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जिले में दर्जनों फैक्ट्री, कोलियरी, वाशरी, रेलवे साइडिंग, ट्रांसपोर्टिंग से बड़े पैमाने पर हो रहा प्रदूषण

रामगढ़। रामगढ़ जिला लंबे समय से झारखंड के प्रमुख औद्योगिक क्षेत्रों में से एक रहा है। यहां कोयला खदानें, कोल वॉशरीज़, स्पंज आयरन, ट्रांसपोर्टेशन हब और अनेक प्रकार के उद्योग संचालित हैं। क्षेत्र में कोयले के व्यापार का बड़ा केंद्र कुजु भी है, जहां प्रतिदिन सैकड़ों ट्रकों की आवाजाही होती है। आर्थिक गतिविधियों के साथ-साथ प्रदूषण का मुद्दा भी लगातार चर्चा में बना रहता है। रामगढ़ जिला में प्रदूषण फैलाने की दिशा में कई कोयला से संबंधित बड़ी फैक्ट्रियां, ईंट भट्टे, कोलियरी, ट्रांसपोर्टिंग, रेलवे साइडिंग, कोयला, बालू और पत्थर का अवैध खनन अपना बड़ा योगदान दे रहे हैं।

रामगढ़ जिला के पतरातु, रामगढ़, मांडू, गोला और चितरपुर प्रखंड में कोयला से संबंधित कई छोटी बड़ी फैक्ट्रियां लगी हुई हैं। वहीं इन क्षेत्रों में स्थित रेलवे स्टेशन की साइडिंग से कोयला और पत्थरों की ट्रांसपोर्टिंग होती है। जिला के इन प्रखंडों में सैकड़ों की संख्या में छोटे बड़े ईंट भट्ठे हैं। जिला में ट्रांसपोर्टिंग भी प्रदूषण फैलाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। जिला के विभिन्न क्षेत्रों में प्रदूषण फैलने की कोई नई बात नहीं है, लेकिन पिछले कुछ समय से जिला में प्रदूषण की आवाज तेजी से उठने लगी है।

पिछले कुछ महीनों में जिले में प्रदूषण को लेकर बहस तेज हुई है। स्थानीय स्तर पर यह प्रश्न उठाया जा रहा है कि जब पूरे क्षेत्र में कई उद्योग एवं कोयला परिवहन से धूल और धुएं का उत्सर्जन होता है, तब रामगढ़ औद्योगिक क्षेत्र में स्थित केवल एक विशेष उद्योग को ही प्रदूषण का “मुख्य कारण” बताकर लगातार निशाने पर क्यों लिया जा रहा है। कुछ सामाजिक संगठनों और स्थानीय लोगों का आरोप है कि औद्योगिक क्षेत्र में प्रदूषण की समस्या सामूहिक है,परंतु उसे एक ही इकाई तक सीमित कर दिया गया है।

संबंधित उद्योग प्रबंधन ने हमेशा कहा है कि वे प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के सभी मानकों का पालन करते हैं। उन्होंने दावा किया कि इकाई में इलेक्ट्रोस्टैटिक प्रीसिपिटेटर, डस्ट कंट्रोल सिस्टम, वाटर स्प्रिंकलिंग और ग्रीन बेल्ट डेवलपमेंट जैसी व्यवस्थाएं लागू हैं और नियमित मॉनिटरिंग की जाती है। उनकी मानें, तो व्यवस्थित पालन के बावजूद उन्हें चुनिंदा तौर पर बदनाम करने की कोशिश की जा रही है। प्रबंधन का यह भी कहना है कि उद्योग के आसपास लगभग 10 हज़ार से अधिक लोगों की आजीविका प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से जुड़ी हुई है और नकारात्मक माहौल बनने से रोजगार पर भी असर पड़ सकता है।

वहीं पर्यावरण कार्यकर्ताओं का कहना है कि पूरे क्षेत्र में समग्र अध्ययन की आवश्यकता है। उनका मत है कि केवल एक उद्योग ही नहीं, बल्कि कोयला खनन, वॉशरीज़, ढुलाई, डंपिंग यार्ड और खुली कोयला मंडियों से भी वायु गुणवत्ता प्रभावित होती है। विशेषज्ञों का सुझाव है कि प्रदूषण के वास्तविक स्रोतों की पहचान के लिए वैज्ञानिक सर्वे, एयर-क्वालिटी मॉनिटरिंग और पारदर्शी रिपोर्टिंग अनिवार्य होनी चाहिए।

स्थानीय नागरिकों के बीच भी मतभेद दिखाई देते हैं। कुछ लोग प्रदूषण से स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं की शिकायत करते हैं, जबकि बड़ी संख्या में लोग उद्योगों के कारण मिल रहे रोज़गार और आर्थिक गतिविधियों के पक्ष में भी आवाज़ उठाते हैं। वे मानते हैं कि नियमों के अनुपालन के साथ उद्योग और पर्यावरण दोनों का संतुलन संभव है।

विशेषज्ञों का मानना है कि समस्या का समाधान किसी एक इकाई को दोषी ठहराने से नहीं, बल्कि समग्र दृष्टिकोण अपनाने से निकलेगा। आवश्यकता इस बात की है कि क्षेत्र के सभी उद्योग, परिवहनकर्ता और प्रशासन मिलकर प्रदूषण नियंत्रण के ठोस उपायों पर काम करें। साथ ही पारदर्शिता के साथ नियमित पर्यावरणीय आंकड़े सार्वजनिक किए जाएं।

रामगढ़ के औद्योगिक परिदृश्य में यह बहस सिर्फ आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित नहीं है, बल्कि यह रोज़गार, स्वास्थ्य, उद्योग और विकास के बीच संतुलन की बड़ी चुनौती भी है। अब निगाहें प्रशासन और नियामक एजेंसियों पर हैं कि वे व्यापक अध्ययन कर निष्पक्ष और तथ्य आधारित कदम कब उठाते हैं।

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