रांची। राजधानी रांची स्थित ऐतिहासिक आड्रे हाउस में इन दिनों समकालीन कला की एक ऐसी झलक देखने को मिल रही है, जो दर्शकों को आत्मचिंतन पर मजबूर कर रही है। जाने-माने कलाकार संजय शर्मा की पेंटिंग ‘डेमो करेंसी’ यहां आकर्षण का केंद्र बनी हुई है। यथार्थवाद और अति-यथार्थवाद (सरेलियज्म) का यह अनूठा संगम आधुनिक समाज में बढ़ते अलगाव और व्यक्ति की खोती पहचान को बड़ी सूक्ष्मता से बयां करता है।
समाज के ‘ग्रिड’ में कैद मानवीय संवेदनाएं
एक्रेलिक कैनवास पर बनी यह कृति एक ‘दृश्य डायरी’ की तरह है। संजय शर्मा ने इसमें समाज को एक ग्रिड के रूप में दिखाया है, जहां झरोखे, खिड़कियां न होकर व्यक्तिगत सीमाओं और बंदिशों का प्रतीक हैं। पेंटिंग की सबसे खास बात यह है कि इसमें अधिकांश पात्रों की पीठ दर्शक की ओर है, जो आधुनिकता की दौड़ में हमारी लुप्त होती पहचान को दर्शाती है। केंद्र में खड़ा मौन साक्षी हर देखने वाले से यह सवाल पूछता है कि विकास की इस आपाधापी में हम वास्तव में किस ओर जा रहे हैं?
तिहाड़ से संसद भवन तक कला का सफर
मूल रूप से दिल्ली के प्रतिष्ठित ‘कॉलेज ऑफ आर्ट’ से स्नातकोत्तर संजय शर्मा का कला सफर बेहद प्रभावशाली रहा है। उनकी ख्याति केवल प्रदर्शनी कक्षों तक सीमित नहीं है। 2012 में उन्होंने तिहाड़ जेल में आर्ट स्कूल की स्थापना कर कैदियों के सुधार की नई राह खोली। दिल्ली मेट्रो के सीलमपुर और शाहदरा स्टेशनों पर उनके बनाए भित्ति चित्र आज भी लाखों यात्रियों को प्रेरित करते हैं। उनके द्वारा बनाया गया लोकसभा के पूर्व अध्यक्ष जी. वी. मावलंकर का तैल चित्र संसद भवन की शोभा बढ़ा रहा है। इसके अलावा उन्होंने भारत सरकार के ‘जल उत्सव’ का लोगो भी डिजाइन किया है।
वैश्विक पटल पर भारतीय कला की गूंज
ढाई दशकों से सक्रिय श्री शर्मा की कला की गूंज जर्मनी, लंदन और बांग्लादेश तक पहुंच चुकी है। वर्तमान में ‘दिल्ली स्किल एंड एंटरप्रेन्योरशिप यूनिवर्सिटी’ जैसे संस्थानों में अपनी सेवाएं दे चुके शर्मा कला सृजन के साथ-साथ एक समर्पित शिक्षक और निर्णायक की भूमिका भी निभा रहे हैं। आड्रे हाउस में उनकी यह नवीनतम कृति ‘डेमो-करेंसी’ न केवल उनकी तकनीकी दक्षता को दिखाती है, बल्कि एक संवेदनशील कलाकार के सामाजिक नजरिए को भी स्पष्ट करती है।
“मेरी कला केवल रंगों का खेल नहीं, बल्कि समाज के विभिन्न वर्गों और उनकी अनकही कहानियों को आवाज देने का एक प्रयास है।”
-संजय शर्मा, कलाकार
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