HBD: बालश्रम से मुक्त कराकर लाखों बच्चों की बुलंद आवाज बने कैलाश सत्यार्थी

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नई दिल्ली। समाजसेवी कैलाश सत्यार्थी आजाद भारत के पहले ऐसे नागरिक हैं, जिन्हें बाल मजदूरी, बाल दुर्व्यापार (ट्रैफिकिंग), बाल दासता, यौन उत्पीड़न और अशिक्षा के खिलाफ लंबे संघर्ष के लिए 2014 में नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। वे अभी भी अपने कार्यक्षेत्र में सक्रिय हैं।

कैलाश सत्यार्थी का जन्म 11 जनवरी 1954 को मध्य प्रदेश के विदिशा जिले में हुआ था। वे पत्नी, बेटे, बहू और बेटी के साथ दिल्ली में रहते है। कैलाश ने अपने करियर की शुरुआत एक इलेक्ट्रॉनिक इंजीनियर के रूप में की थी। हालांकि, 26 साल की उम्र में नौकरी छोड़कर उन्होंने बच्चों के अधिकारों के लिए काम करना शुरू कर दिया। कैलाश वर्तमान में ‘ग्लोबल मार्च अगेंस्ट चाइल्ड लेबर’ के अध्यक्ष भी हैं। कैलाश अब तक हजारों बाल मजदूरों को मजदूरी से मुक्त कराकर उन्हें शिक्षित कर रहे हैं। उन्हें नोबेल पुरस्कार से भी नवाजा जा चुका है।

सत्यार्थी ने दुनिया भर के 144 देशों में 83000 से अधिक बच्चों के अधिकारों की रक्षा के लिए काम किया है। कोरोना काल में कैलाश सत्यार्थी के संगठन ‘बचपन बचाओ आंदोलन’ ने सरकारी एजेसियों के साथ मिलकर 13 हजार से बच्चों को ट्रैफिकिंग और बाल श्रम की बेड़ियों से मुक्त कराया है। वे अभी तक 1 लाख से ज्यादा बच्चों को आधिकारिक तौर पर मुक्त करवा चुके हैं। सत्यार्थी इंटरनेशनल सेंटर ऑन चाइल्ड, लेबर एंड एजुकेशन से भी जुड़े हुए हैं। ये संगठन कई सामाजिक संगठनों, शिक्षकों और ट्रेड यूनियनों का एक समूह है, जिन्होंने शिक्षा के प्रसार के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अभियान शुरू किया है।