असम। असम में झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के हेलिकॉप्टर को उड़ान भरने से रोका गया। इसके बाद सीएम हेमंत ने चुनाव प्रचार का जो तरीका अपनाया, उसकी अब खूब चर्चा हो रही है। आइए जानें पूरा मामला…
झामुमो के प्रत्याशियों के पक्ष में चुनाव प्रचार के अंतिम दिन मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को दो विधानसभा क्षेत्रों में आयोजित जनसभा में भाग लेने का मौका नहीं मिला। प्रशासन द्वारा उनके हेलिकॉप्टर को उड़ान भरने की इजाजत नहीं दी गई। रविवार को विधायक कल्पना सोरेन को भी ऐसी ही परिस्थितियों का सामना करना पड़ा था।
इसके बाद हेमंत सोरेन ने कहा कि असम की वीर और क्रांतिकारी धरती पर लोकतंत्र की आवाज को दबाने की फिर कोशिशें की गई।
कल कल्पना जी को सभा करने से रोका गया और आज मुझे असम के रोंगोनदी और चाबुआ विधानसभा के अपने भाई-बहनों से मिलने नहीं दिया गया।
उन्होंने सवाल पूछा है कि क्या सच में विरोधियों को लगता है कि संवैधानिक संस्थाओं का दुरुपयोग कर ऐसे षड्यंत्र से वे तीर-धनुष की ताकत को रोक पाएंगे?
हेमंत सोरेन ने चुनौती दी है कि इतने वर्षों तक तो चाय बागान के मेरे लाखों शोषित, वंचित आदिवासी समाज के भाइयों बहनों को रोकने की नाकाम कोशिश की है। और कितना रोक पाओगे?
इतिहास गवाह है, जब-जब आवाज दबाई गई है, वह और बुलंद होकर उभरी है। नौ अप्रैल को तीर-धनुष पर बटन दबाकर मेरे ये लाखों भाई-बहन अपने संघर्ष का हिसाब लेकर रहेंगे।
मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने असम विधानसभा चुनाव के अंतर्गत चाबुआ-लाहोवाल विधानसभा सीट से झारखंड मुक्ति मोर्चा के प्रत्याशी भूबेन मुरारी के समर्थन में आयोजित चुनावी जनसभा को आनलाइन माध्यम से संबोधित किया।
अपने संबोधन में मुख्यमंत्री ने सत्ता के दुरुपयोग पर गहरा दुख व्यक्त करते हुए कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कार्यक्रम की वजह से उनके हेलिकॉप्टर को उड़ान भरने की अनुमति नहीं दी गई।
उन्होंने इसे लोकतांत्रिक प्रक्रिया को प्रभावित करने का एक सुनियोजित प्रयास करार देते हुए कहा कि सत्ता और ताकत के बल पर किसी को प्रचार से रोकना बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है।
ये लोग वोट चोरी और राजनीति दल के प्रचार प्रसार में बाधा डालते हैं। ऐसी बाधाएं झारखंड मुक्ति मोर्चा के हक और सम्मान की लड़ाई को कमजोर नहीं कर सकतीं।
मुख्यमंत्री ने चाय बागान क्षेत्रों की दयनीय स्थिति पर चिंता जताते हुए कहा कि झामुमो ने इन क्षेत्रों को इसलिए चुना है, क्योंकि यहां के मजदूर और आदिवासी वर्षों से उपेक्षा का शिकार हैं।
आज के समय में चाय बागान श्रमिकों को कम से कम 500 रुपये प्रतिदिन की न्यूनतम मजदूरी मिलनी चाहिए। इसके साथ ही उन्होंने असम में रह रहे आदिवासी समुदाय को अब तक आदिवासी का दर्जा न मिलने पर भी सवाल उठाए और इसे व्यवस्था की एक बड़ी विफलता बताया।
सीएम ने कहा कि आज असम में महिलाओं के खातों मेंं 9000 रुपये डालने की बात की जा रही है, लेकिन यह सोचने की जरूरत है कि क्या ये रुपए आने वाले पांच वर्षों के लिए आपके जीवन को सुरक्षित और बेहतर बना सकते हैं। आप किसी के बहकावे में न आएं और अपनी सामूहिक शक्ति को पहचानते हुए एकजुट हों।
मुख्यमंत्री ने विश्वास जताया कि यदि पूरा समाज एक छत के नीचे खड़ा होकर अपने अधिकारों की मांग करेगा, तो सरकार को उनकी ताकत के आगे झुकना ही पड़ेगा और तभी इस क्षेत्र के श्रमिकों व आदिवासियों के सुनहरे भविष्य की नींव रखी जा सकेगी।
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