- राज्य को ‘जीरो नॉन-डिस्क्रिप्ट जोन’ बनाने का लक्ष्य
- रांची के सोनाहातू व राहे प्रखंड के गांवों में सर्वेक्षण
रांची। बिरसा कृषि विश्वविद्यालय (BAU) झारखंड के स्थानीय पशुधन एवं कुक्कुट की अब तक गैर-वर्णित और गैर-चिह्नित आबादी की पहचान, वैज्ञानिक दस्तावेजीकरण तथा नस्ल पंजीकरण की दिशा में जुटा है। इसी क्रम में 24 अक्टूबर को बीएयू की टीम ने रांची जिले के सोनाहातू प्रखंड के सेरेंगहातु एवं राहे प्रखंड के गोवाली और बरवाडीह गांवों में व्यापक सर्वेक्षण किया। इससे पहले टीम राहे और बुंडू प्रखंडों में आधारभूत सर्वेक्षण एवं मानचित्रण का कार्य पूरा कर चुकी है।
यह अभियान वर्ष 2024 में प्रारम्भ किये गये बीएयू के पशु आनुवंशिक संसाधन अनुसंधान केंद्र के माध्यम से संचालित किया जा रहा है। विश्वविद्यालय की टीम भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के वित्तपोषण से संचालित नेटवर्क परियोजना ऑन एनिमल जेनेटिक रिसोर्सेज के तहत कार्य कर रही है।
यह परियोजना आईसीएआर के राष्ट्रीय पशु आनुवंशिक संसाधन ब्यूरो (एनबीएजीआर), करनाल की पहल है, जिसके अंतर्गत देश के स्थानीय पशु आनुवंशिक संसाधनों का वैज्ञानिक सर्वेक्षण और नस्लों की पहचान की जाती है।
परियोजना की प्रधान अन्वेषक (पीआई) डॉ नंदनी कुमारी ने बताया कि सर्वेक्षण के दौरान टीम को नदी पार करने, दुर्गम पहाड़ी रास्तों और मारंगबुरु पहाड़ियों के हाथियों की मौजूदगी वाले वन क्षेत्रों से होकर गुजरना पड़ा। इन कठिन परिस्थितियों के बावजूद स्थानीय पशुधन की पहचान और संरक्षण के उद्देश्य से टीम ने अपना अभियान जारी रखा।
परियोजना के सह-प्रधान अन्वेषक डॉ नरेंद्र प्रताप सिंह और डॉ शैलेन्द्र कुमार रजक ने कहा कि स्थानीय पशु नस्लों के वैज्ञानिक संरक्षण के लिए उनका औपचारिक पंजीकरण आवश्यक है। आधिकारिक पहचान मिलने से झारखंड के स्वदेशी पशुओं की आनुवंशिक विविधता, प्राकृतिक अनुकूलन क्षमता और विशिष्ट गुणों को संरक्षित करने में मदद मिलेगी।
सर्वेक्षण के दौरान वैज्ञानिकों ने गांवों में घर-घर जाकर पशुपालकों से विस्तृत आंकड़े एकत्र किए। पूर्ववर्ती सर्वेक्षणों के दौरान राहे प्रखंड के गोवाली, गोंदा और डोकाद गांवों में किसानों द्वारा अपनाई जाने वाली पारंपरिक पशु चिकित्सा पद्धतियों की जानकारी भी जुटाई गई। पशुओं के स्वास्थ्य एवं उत्पादकता में सुधार के उद्देश्य से पशुपालकों के बीच उच्च गुणवत्ता वाले खनिज मिश्रण का वितरण भी किया गया।
बीएयू का लक्ष्य झारखंड को ‘जीरो नॉन-डिस्क्रिप्ट जोन’ बनाना है, ताकि राज्य के स्थानीय पशुधन को गैर-वर्णित श्रेणी से बाहर लाकर उनकी वैज्ञानिक पहचान और नस्ल पंजीकरण सुनिश्चित किया जा सके। इस पहल में पारंपरिक पशुधन और कुक्कुट के साथ स्थानीय कुत्तों की आबादी को भी शामिल किया गया है।
विश्वविद्यालय की टीम अन्य दो जिलों में भी इसी आबादी का सर्वेक्षण और आंकड़ों का संकलन करेगी, ताकि उपयुक्त नस्लों को पंजीकरण के लिए प्रस्तुत किया जा सके।
हमारे साथ जुड़ें
व्हाट्सएप ग्रुप
https://chat.whatsapp.com/H5n5EBsvk6S4fpctWHfcLK
स्वदेशी एप ग्रुप
https://chat.arattai.in/groups/t43545f313238383036363337343930333731343936395f32303030323937303330392d47437c3031303131353032363138323137353934323036313934393230
यहां सीधे पढ़ें खबरें
खबरें और भी हैं। इसे आप अपने न्यूज वेब पोर्टल dainikbharat24.com पर सीधे भी जाकर पढ़ सकते हैं। नोटिफिकेशन को अलाउ कर खबरों से अपडेट रह सकते हैं। साथ ही, सुविधा के मुताबिक अन्य खबरें भी पढ़ सकते हैं।
आप अपने न्यूज वेब पोर्टल से फेसबुक, इंस्टाग्राम, X, स्वदेशी एप arattai सहित अन्य सोशल मीडिया पर भी जुड़ सकते हैं। खबरें पढ़ सकते हैं। सीधे गूगल हिन्दी न्यूज पर जाकर खबरें पढ़ सकते हैं। अपने सुझाव या खबरें हमें dainikbharat24@gmail.com पर भेजें।

