पहली बार हेल्थ इंश्योरेंस लेते समय होती है ये आम गलतियां

विचार / फीचर देश
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अमरनाथ सक्सेना

कई लोगों के लिए, हेल्थ इंश्योरेंस लेना एक बड़ी बात होती है। हालांकि, पहली बार हेल्थ इंश्योरेंस खरीदने वाले लोग अक्सर ऐसे विकल्प चुन लेते हैं, जो उनके हेल्थ कवर की प्रभावशीलता को सीमित कर देते हैं।

ये गलतियां अक्सर इसलिए होती हैं, क्योंकि लोग लंबे समय की सुरक्षा को छोड़कर तुरंत होने वाली पैसों की बचत को ज़्यादा अहमियत देते हैं। ज़रूरत से कम राशि की कवरेज लेने और पॉलिसी में बारीक अक्षरों में लिखे हुए नियमों को न पढ़ने जैसी गलतियां, किसी मेडिकल इमरजेंसी के वक्त आपके लिए बड़े आर्थिक नुकसान का कारण बन सकती हैं।

चलिए देखते हैं कि लोग आमतौर पर क्या गलतियां करते हैं और इनका आपके हेल्थ इंश्योरेंस पर क्या असर पड़ता है।

ज़रूरत से कम कवरेज/सम इंश्योर्ड चुनना

पहली बार हेल्थ इंश्योरेंस लेने वाले लोग अक्सर कम प्रीमियम भरने के चक्कर में कम पैसों का इंश्योरेंस चुनते हैं। शुरुआत में तो यह सोचना सही लगता है कि पैसे बच रहे हैं। हालांकि, असलियत में जब कोई बड़ा इलाज करवाना पड़ता है, तब यह भारी मुसीबत बन सकता है। अगर आपकी कवरेज ज़रूरत से कम है, तो इंश्योरेंस कंपनी सिर्फ उतनी ही रकम देगी जितनी पॉलिसी में लिखी है। बाकी सारा पैसा आपको अपनी जेब से देना पड़ेगा।

ऐसे में इंश्योरेंस कराने का फायदा ही क्या, जब मुसीबत के वक्त सारा पैसों का बोझ आपको ही उठाना पड़े। आजकल इंश्योरेंस की रकम, इलाज में होने वाले भारी खर्च को देखते हुए ही चुननी चाहिए, ताकि जब कोई बड़ा खर्च आए तो दिक्कत न हो।

प्रतीक्षा अवधि पर ध्यान नहीं देना

हेल्थ इंश्योरेंस लेते ही सारे फायदे तुरंत नहीं मिलते, कुछ बीमारियों के क्लेम के लिए कुछ समय का इंतज़ार करना पड़ता है। अगर इंश्योरेंस लेते समय, आपको पहले से शुगर, बीपी या अस्थमा जैसी बीमारियां हैं या फिर आपका मैटरनिटी केयर और कुछ निर्धारित ऑपरेशन का खर्च तय है, तो इंश्योरेंस कंपनी इन्हें तुरंत कवर नहीं करती।

अलग-अलग पॉलिसी के अनुसार, प्रतीक्षा अवधि कुछ महीनों से लेकर कुछ वर्षों तक हो सकती है। पहली बार इंश्योरेंस खरीदने वाले जो लोग इस बात पर ध्यान नहीं देते, वे अक्सर यह मान लेते हैं कि उन्हें पहले दिन से ही पूरा कवरेज मिल गया है, लेकिन बाद में उनका क्लेम अस्वीकार हो जाता है।

प्रतीक्षा अवधि के बारे में जानना इसलिए ज़रूरी है, ताकि आप शुरुआत में होने वाले खर्चों का इंतज़ाम पहले से कर सकें और आपको पक्का पता हो कि इंश्योरेंस कंपनी कितने समय के बाद आपको कवर करेगी।

एक्सक्लूज़न पर ध्यान न देना

नए खरीदारों द्वारा की जाने वाली सबसे बड़ी गलतियों में से एक है अपनी पॉलिसी डॉक्यूमेंट में बारीक अक्षरों में लिखी शर्तों को न पढ़ना। हर हेल्थ इंश्योरेंस प्लान में कुछ एक्सक्लूज़न होते हैं, यानी ऐसे खास इलाज या बीमारियां जो उस पॉलिसी के तहत कवर नहीं होती हैं, जैसे कि खुद को चोट पहुंचाना, कॉस्मेटिक सर्जरी, दांतों का इलाज, मोटापा घटाने का इलाज या कुछ वैकल्पिक इलाज।

हर इंश्योरेंस कंपनी के एक्सक्लूज़न के नियम अलग-अलग हो सकते हैं, इसलिए पॉलिसी को ध्यान से पढ़ना और यह समझना ज़रूरी है कि इसमें क्या-क्या कवर नहीं है। यह आपको अप्रत्याशित खर्चों से बचने में मदद करता है और यह सुनिश्चित करता है कि आपको पक्का पता हो कि आपका प्लान किस चीज़ के लिए भुगतान करेगा।

रिन्यू करने के नियम न देखना

जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है, बीमारियों का खतरा भी बढ़ता जाता है, इसलिए जवानी के मुकाबले बुढ़ापे में इंश्योरेंस की ज़रूरत ज़्यादा होती है। पहली बार पॉलिसी खरीदते समय, यह सुनिश्चित करें कि जैसे-जैसे आपकी उम्र बढ़े, आपका कवरेज कम न हो। यह भी बहुत ज़रूरी है कि आप समय-समय पर अपने इंश्योरेंस कवरेज की समीक्षा करते रहें। रिन्यूअल के समय अपने इंश्योरेंस कंपनी से पता करें कि आप अपने सम इंश्योर्ड राशि और उसकी लिमिट्स को कैसे बढ़ा सकते हैं।

आपकी इंश्योरेंस कंपनी आपको अतिरिक्त कवरेज तो दे देगी, लेकिन बढ़ाए गए सम इंश्योर्ड या कवरेज पर नई प्रतीक्षा अवधि लागू हो सकती है। IRDAI के नियमों के मुताबिक, धोखाधड़ी के मामलों को छोड़कर कोई भी इंश्योरेंस कंपनी आपकी हेल्थ इंश्योरेंस पॉलिसी को रिन्यू करने से मना नहीं कर सकती। इसीलिए यह बहुत ज़रूरी हो जाता है कि आप अपने कवरेज को लगातार चेक करते रहें, ताकि आपकी पॉलिसी आपकी बदलती स्वास्थ्य संबंधी ज़रूरतों को पूरा करती रहे।

जेब से होने वाले खर्च

आम तौर पर हेल्थ इंश्योरेंस पॉलिसी हॉस्पिटल में भर्ती होने के दौरान आने वाले मेडिकल खर्चों को कवर करती हैं। ऐसी पॉलिसी की तलाश करें जो नॉन-मेडिकल खर्चों को कवर करती हों और एक निश्चित राशि (डेली कैश) का भी भुगतान करती हों, ताकि आपको अपने ऊपरी या फुटकर खर्चों को पूरा करने में मदद मिले।

विभिन्न प्लान्स की तुलना न करना

कई लोग पहली बार हेल्थ इंश्योरेंस खरीदते समय बिना दूसरे विकल्प देखे, एजेंट या कंपनी द्वारा दी गई पहली पॉलिसी ही ले लेते हैं। ऐसा करने से वे बड़ा कवरेज, कम प्रीमियम या ज़रूरी ऐड-ऑन – जैसे कि क्रिटिकल इलनेस राइडर, मैटरनिटी बेनिफिट, ओपीडी कवर, मेंटल हेल्थ सपोर्ट या पर्सनल एक्सीडेंट राइडर का लाभ लेने से चूक जाते हैं।

इंश्योरेंस कंपनियों के हॉस्पिटल नेटवर्क की क्षमता, क्लेम सेटलमेंट रेशियो, क्लेम स्वीकार होने में लगने वाला समय और कस्टमर सपोर्ट की क्वालिटी अलग-अलग होती है।

इसके अलावा, उम्र, लाइफस्टाइल, परिवार के सदस्यों की संख्या, मेडिकल हिस्ट्री और वित्तीय लक्ष्यों के आधार पर हर व्यक्ति की ज़रूरतें भी अलग होती हैं। हो सकता है जो प्लान किसी व्यक्ति के लिए सही हो, वही प्लान दूसरे व्यक्ति के लिए उपयुक्त न हो।

विभिन्न प्लान की तुलना करने से खरीदार अपने काम के ऐड-ऑन्स चुन पाते हैं, बेवजह के कवरेज के लिए भुगतान करने से बचते हैं और अपनी ज़रूरत के अनुसार एक ऐसी हेल्थ इंश्योरेंस पॉलिसी तैयार कर पाते हैं जो बेहतर वैल्यू और लंबे समय तक सुरक्षा देती है।

सही हेल्थ इंश्योरेंस चुनने के लिए केवल प्रीमियम देखना ही काफी नहीं है, बल्कि इसके लिए कवरेज की सीमाओं, प्रतीक्षा अवधि, एक्सक्लूज़न, रिन्यू कर पाने की क्षमता और अलग-अलग प्लान्स की तुलना करने पर भी पूरा ध्यान देना ज़रूरी है।

पहली बार इंश्योरेंस खरीदने वाले लोग अक्सर इन बारीकियों को नज़रअंदाज़ कर देते हैं, जिसकी वजह से बीमारी या मेडिकल इमरजेंसी के समय उन्हें अचानक अपनी जेब से पैसे खर्च करने पड़ सकते हैं और उम्मीद के मुताबिक पूरी मदद भी नहीं मिल पाती।

पॉलिसी की बारीकी से जांच करके और अपनी वर्तमान व भविष्य की ज़रूरतों दोनों को समझकर, पॉलिसी खरीदने वाले ऐसे समझदारी भरे फैसले ले सकते हैं जिससे यह सुनिश्चित होता है कि उनका इंश्योरेंस सबसे मुश्किल समय में सचमुच उनके काम आए।

(लेखक कमर्शियल, बजाज जनरल इंश्योरेंस में चीफ टेक्निकल ऑफिसर हैं)

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