नई दिल्ली। भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्य कांत ने अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) आरक्षण को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। सुनवाई के दौरान उन्होंने सवाल उठाया कि यदि किसी परिवार के दोनों माता-पिता उच्च पदों पर, जैसे IAS अधिकारी हों और परिवार सामाजिक और आर्थिक रूप से सशक्त हो चुका हो, तो क्या उनके बच्चों को भी लगातार आरक्षण का लाभ मिलते रहना चाहिए।
CJI ने कहा कि आरक्षण का वास्तविक उद्देश्य समाज के सबसे वंचित और पिछड़े वर्गों तक अवसर पहुंचाना है। उन्होंने संकेत दिया कि “क्रीमी लेयर” सिद्धांत को SC/ST आरक्षण में लागू करने पर विचार किया जा सकता है, ताकि लाभ केवल उन्हीं लोगों तक पहुंचे जो वास्तव में सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े हैं।
सुनवाई के दौरान उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि अगर किसी परिवार ने शिक्षा, सरकारी सेवा और आर्थिक स्थिति के मामले में काफी प्रगति कर ली है, तो उस परिवार की अगली पीढ़ी और उन परिवारों के बीच अंतर करना जरूरी हो सकता है जो अब भी गंभीर सामाजिक भेदभाव और आर्थिक कठिनाइयों का सामना कर रहे हैं।
“क्रीमी लेयर” का सिद्धांत फिलहाल अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) आरक्षण में लागू है, जिसके तहत आर्थिक और सामाजिक रूप से आगे निकल चुके परिवारों को आरक्षण का लाभ नहीं मिलता। SC/ST वर्ग में इसे लागू करने का मुद्दा लंबे समय से संवेदनशील और विवादित रहा है।
CJI की इस टिप्पणी के बाद राजनीतिक और सामाजिक हलकों में नई बहस शुरू हो गई है। कुछ लोगों का मानना है कि इससे आरक्षण का लाभ वास्तव में जरूरतमंद लोगों तक पहुंच सकेगा।
कई सामाजिक संगठनों का तर्क है कि SC/ST समुदाय अब भी व्यापक सामाजिक भेदभाव का सामना करते हैं, इसलिए क्रीमी लेयर लागू करना उचित नहीं होगा। फिलहाल यह अदालत की टिप्पणी है और इस विषय पर कोई अंतिम फैसला नहीं आया है। मामले की सुनवाई आगे भी जारी रहने की संभावना है।
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