आदिम जनजातियों के हक पर डाका, ‘डाकिया योजना’ के नाम पर खानापूर्ति

झारखंड
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  • प्रखंड कार्यालय की नाक के नीचे चल रहा खेल
  • महिलाओं ने खोली वितरण व्यवस्था की पोल

गुमला। च्सरकारी दावों और जमीनी हकीकत के बीच बड़ा फासला होता है। इसका जीता-जागता उदाहरण चैनपुर प्रखंड के लुपुंगपाठ सहित आदिम जनजाति परिवारों में देखने को मिल रहा है। ‘डाकिया योजना’ के तहत आदिम जनजाति परिवारों को घर बैठे 35 किलो राशन देने का प्रावधान है। हालांकि, यह योजना लुपुंगपाठ, लुपुंगनवाटोली सहित पीवीटीजी परिवारों में दम तोड़ती नजर आ रही है। ग्रामीणों का आरोप है कि उन्हें ना तो समय पर राशन मिल रहा है और ना ही पूरी मात्रा में।

रजिस्टर में 35, हाथ में 30 किलो

लुपुंगपाठ निवासी जयमंती असुर और अन्य महिलाओं का कहना है कि उनके राशन कार्ड और सरकारी रजिस्टर में तो 35 किलो चावल, दाल और चीनी दर्ज कर दी जाती है, लेकिन हकीकत में उन्हें कभी 30 किलो तो कभी 33 किलो ही राशन दिया जा रहा है। विशेष रूप से चावल की मात्रा में भारी कटौती की जा रही है।

अवैध वसूली और वितरण में देरी

ग्रामीणों ने बताया कि राशन वितरण में भारी अनियमितता है। नियमतः राशन महीने की 15 तारीख तक मिल जाना चाहिए, लेकिन उन्हें महीने के अंत तक इंतजार कराया जाता है। ग्रामीणों ने बताया कि मुफ्त राशन के बदले उनसे 100 रुपये तक वसूला जा रहा है। वहीं, पौष्टिक आहार के नाम पर मिलने वाली दाल और चीनी साल में बमुश्किल दो-तीन बार ही मिलता है।

बिना सील के बोरों से ‘चोरी’ का अंदेशा

फिलमोनस असुर और अन्य ग्रामीणों ने बताया कि राशन के बोरों पर कोई आधिकारिक सील नहीं होती। बोरों को हाथ से सिलकर दिया जाता है, जिससे रास्ते में राशन चोरी की पूरी गुंजाइश बनी रहती है। ‘डाकिया योजना’ का उद्देश्य राशन घर तक पहुंचाना है, लेकिन बुजुर्गों को खुद लुपुंगनवाटोली जैसे स्थानों से राशन ढोकर लाना पड़ रहा है।

हस्तक्षेप के बाद भी सुधार नहीं

पिछले फरवरी में जब ग्रामीणों ने हंगामा किया, तब बीडीओ यादव बैठा और बीएसओ अरुण यादव ने मौके पर पहुंचकर नाप-तौल कराई थी। उस समय तो 35 किलो राशन मिला, लेकिन अधिकारियों के जाते ही व्यवस्था फिर पटरी से उतर गई। अब तौल होने पर पता चल रहा है कि किसी को 27 किलो तो किसी को 30 किलो राशन मिल रहा है।

पहचान छिपाकर आते हैं वितरक

बुजुर्ग ग्रामीणों ने बताया कि राशन बांटने हर बार अलग-अलग लोग आते हैं। जब उनसे नाम पूछा जाता है, तब वे अपनी पहचान छिपाते हैं या ‘चिल्ला’ जैसा फर्जी नाम बताते हैं, ताकि कोई शिकायत नहीं कर सके।

ग्रामीणों ने रखीं ये मांगें

ग्रामीणों की दो टूक मांग डाकिया योजना के तहत 35 किलो राशन घर की चौखट पर मिले। राशन के बोरों पर आधिकारिक सील सुनिश्चित हो। निर्धारित मात्रा से कम राशन देने वाले और अवैध वसूली करने वालों पर सख्त कार्रवाई हो।

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