उत्तराखंड। हल्द्वानी में रेलवे भूमि पर कब्जे को लेकर चल रहे विवाद में सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान सख्त रुख अपनाया है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली बेंच ने साफ कहा कि सार्वजनिक भूमि पर कब्जा करने वालों को वहां रहने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है।
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने स्पष्ट किया कि रेलवे की जमीन राज्य की संपत्ति है और उसका उपयोग कैसे होगा, यह तय करना सरकार का अधिकार है।
कोर्ट ने कहा कि कब्जाधारक रेलवे को यह निर्देश नहीं दे सकते कि ट्रैक कहां बने या परियोजना कैसे चले।
न्यायालय ने माना कि यह भूमि सार्वजनिक है और उस पर रहने का अधिकार “अधिकार” नहीं बल्कि अधिकतम “रियायत” हो सकता है।
सीजेआई सूर्यकांत ने सवाल उठाया कि जब लोगों को बेहतर सुविधाओं वाली जगह दी जा सकती है, तो उसी जगह रहने की जिद क्यों की जा रही है।
कोर्ट ने कहा कि प्रभावित परिवारों को बेहतर आवास योजनाओं जैसे पीएम आवास योजना में बसाया जा सकता है।
अदालत ने यह भी कहा कि रेलवे ट्रैक के पास रहना खतरनाक और अस्वास्थ्यकर है, इसलिए पुनर्वास बेहतर विकल्प है।
करीब 4,000–5,000 परिवार हल्द्वानी के बनभूलपुरा क्षेत्र में रेलवे जमीन पर रह रहे हैं। कुल मिलाकर लगभग 50,000 लोग इस विवाद से जुड़े हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने संकेत दिया कि रेलवे विस्तार परियोजना के लिए इन्हें हटना पड़ सकता है।
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और राज्य सरकार को निर्देश दिए हैं कि प्रभावित परिवारों की PM Awas Yojana के तहत पात्रता जांच की जाए।
प्रशासन मौके पर कैम्प लगाकर आवेदन भरवाए। 31 मार्च तक पात्र लोगों की सूची तैयार कर रिपोर्ट कोर्ट में पेश की जाए।
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