रांची। प्रभात प्रकाशन (दिल्ली) के रांची केन्द्र में वरिष्ठ लेखक विद्याभूषण की पांचवां कहानी संग्रह ‘अधिवास की फांस’ का लोकार्पण हुआ। इस कार्यक्रम की अध्यक्षता साहित्य अकादमी में मैथिली सलाहकार समिति के सदस्य प्रमोद कुमार झा ने की। समन्वय और संचालन का कार्य अनामिका प्रिया ने किया।
इस अवसर पर आयोजित परख चर्चा में हिन्दी कहानी के सुचर्चित कथाकार अनिता रश्मि, नीरज नीर, रश्मि शर्मा और पत्रकार संजय कृष्ण ने अपने विचार साझा किए।
अनिता रश्मि ने कहा कि इस संग्रह की अधिकतर कहानियां मैं से शुरू होती हैं, लेकिन ‘मैं’ पर खत्म नहीं होतीं। उनमें झारखंड की सांस्कृतिक विविधता और परिवेश का अंकन चित्रात्मक विवरण में हुआ है। नीरज नीर ने बताया कि इन कहानियों में रोचकता और संवेदनशीलता देर तक बनी रहती है। यथार्थ के
धरातल पर प्रवाहपूर्ण कथायन के कारण यह संग्रह झारखंड के लोकजीवन का प्रामाणिक संदर्भ प्रस्तुत करता है।
रश्मि शर्मा का मानना है कि इन कहानियों में जनजीवन के विविध रंग मौजूद हैं। लेकिन विद्याभूषण जी चरित्रों की कहानी नहीं कहते, परिवेश और परिस्थितियों की कहानी कहते हैं। यहां कथा कथन में नाटकीयता की जगह कथ्य और शिल्प की आवाजाही बनी रहती है।
पत्रकार संजय कृष्ण ने कहा कि अट्ठारह साल पहले जब वे दैनिक अखबार से जुड़कर पहली बार गाजीपुर से रांची आये थे, तब झारखंड को समझने के लिए विद्याभूषण की एक सुचर्चित पुस्तक मददगार बनी थी। इस संग्रह की कहानियों में आदिवासी जीवन और परिवेश का इतिवृत्त मुखर हुआ है।
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